मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वैश्याओं से मांगकर लाई जाती है मिट्टी, इसके बिना अधूरी है दुर्गा पूजा
punjabkesari.in Tuesday, Sep 29, 2026 - 07:14 PM (IST)
नारी डेस्क:हर साल, जब कोलकाता में शरद ऋतु की हवाओं में त्योहार का माहौल घुलने लगता है, तो पूरा शहर रोशनी, रंगों और आस्था के कैनवस में बदल जाता है। यहां दुर्गा पूजा सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है; यह एक भावना है, घर वापसी का जश्न, बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव, और उस दिव्य नारी शक्ति का सम्मान जो रक्षा और पालन-पोषण करती है। इस त्योहार की धड़कन माँ दुर्गा की उस मूर्ति में बसती है, जिसे कोलकाता के कुम्हारों के इलाके 'कुमारटोली' के कुशल कारीगर बड़े प्यार से गढ़ते हैं। फिर भी, इन मूर्तियों की मिट्टी में एक ऐसी अनोखी कहानी छिपी है जो उन लोगों को भी हैरान कर देती है जो बरसों से इस त्योहार का हिस्सा रहे हैं।

वेश्याओं के आंगन की मिट्टी के बिना अधूरी है दुर्गा पूजा
यह कहानी है 'पुण्य माटी' की वह पवित्र मिट्टी जो एक ऐसी जगह से आती है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता: सोनागाछी, जो कोलकाता का सबसे बड़ा रेड-लाइट एरिया है। वेश्याओं के आंगन की मिट्टी को 'निषिद्धो पाली की मिट्टी’ कहा जाता है। मान्यतानुसार जब तक इस जगह की मिट्टी नहीं मिलती है तब तक दुर्गा मूर्ति का निर्माण अधूरा माना जाता है। यदि किसी वजह से इस मिट्टी के बिना ही दुर्गा प्रतिमा बना दी जाती है तो उस मूर्ति का पूजन माता दुर्गा स्वीकार नहीं करती हैं।
पीढ़ियों से निभाई जा रही है ये रस्म
एक पुरानी मान्यता के अनुसार, जो भी व्यक्ति रेड-लाइट एरिया में कदम रखता है, वह अपनी इज्जत, अपनी शर्म और यहां तक कि अपने पाप भी वहीं दरवाज़े पर छोड़ आता है। एक तरह से वहां की मिट्टी उन भावनाओं को सोख लेती है। इसीलिए सोनागाछी से लाई गई मिट्टी को 'पुण्य माटी' यानी पवित्र मिट्टी माना जाता है। यह रस्म पीढ़ियों से चुपचाप निभाई जा रही है। कुमारटोली के कुम्हार मिट्टी लेने से पहले सोनागाछी जाकर सम्मान प्रकट करते हैं। अपनी वर्कशॉप में लौटने के बाद, वे इसे नदी की मिट्टी, पुआल, बांस और जूट की रस्सियों के साथ मिलाते हैं और एक ऐसा ढांचा तैयार करते हैं जो कुछ ही हफ़्तों में दैवीय कृपा से जीवंत लगने लगता है।

मां की नज़र में सब हैं एक
मान्यता यह है कि वेश्यावृति करने वाली स्त्रियों को समाज से बहिस्कृत माना जाता है और उन्हें एक सम्मानजनक दर्जा दिलाने के लिए इस प्रथा का चलन शुरू किया गया था। माना तो यह भी जाता है कि प्रतिमा बनाने वाला व्यक्ति भी माता के प्रति इतना समर्पित होता है कि वैश्यालय के अंगने की मिट्टी लाने के समय उसके मन में बुरे विचार नहीं आते और एक तरह से ऐसा करते हुए वह व्यक्ति अपना कमिटमेंट पूरा कर रहा होता है। इस परीक्षा से गुज़रने के बाद ही उसे प्रतिमा निर्माण करने के काबिल समझा जाता है। पहले के समय में केवल मंदिर का पुजारी ही वेश्यालय के बाहर जाकर वेश्याओं से उनके आंगन की मिट्टी मांगते थे, परंतु अब पुजारी के अलावा मूर्तिकार भी वेश्यालय से मिट्टी मांगने जाते है।इसका संदेश बहुत गहरा है: देवी सबको अपनाती हैं। समाज भले ही कुछ लोगों को "अपवित्र" कहे, लेकिन मां की नज़र में कोई भी ऐसा नहीं है जिसका उद्धार न हो सके।

