क्या आपकी आंखों के सामने भी दिखते हैं धागे या जाले जैसी काले धब्बे? जानें वजह
punjabkesari.in Monday, Jun 22, 2026 - 03:53 PM (IST)
नारी डेस्क: कई लोगों ने कभी न कभी ऐसा अनुभव किया होगा कि साफ आसमान, सफेद दीवार या मोबाइल-लैपटॉप की स्क्रीन देखते समय आंखों के सामने छोटे-छोटे काले धब्बे, धागे या जाले जैसी चीज़े तैरती हुई नजर आती हैं। मेडिकल भाषा में इन्हें "आई फ्लोटर्स" (Eye Floaters) कहा जाता है। अधिकतर मामलों में ये फ्लोटर्स नुकसानदायक नहीं होते और समय के साथ व्यक्ति इनका आदी हो जाता है। लेकिन आंखों के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अचानक इनकी संख्या बढ़ जाए या इनके साथ कुछ अन्य लक्षण दिखाई दें तो यह आंखों की गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। तो चलिए आपको बताते हैं यह क्यों होते हैं और इनके पीछे क्या वजह हैं।
क्या होते हैं Eye Floaters
आई फ्लोटर्स आंखों के सामने दिखाई देने वाले छोटे-छोटे बिंदु, धागे, जाले या तैरती हुई परछाइयों जैसे दिखाई देते हैं। ये वास्तव में आंख के भीतर मौजूद संरचनाओं की छाया होती हैं, जो रेटिना पर पड़ती हैं। ये खासतौर पर तब ज्यादा दिखाई देते हैं जब कोई व्यक्ति चमकीली या सफेद पृष्ठभूमि को देख रहा हो। उदाहरण के लिए साफ आसमान, सफेद दीवार या कंप्यूटर स्क्रीन।

आंख के अंदर क्या होता है
विशेषज्ञों के अनुसार आंख के भीतर एक पारदर्शी जेली जैसा पदार्थ मौजूद होता है, जिसे "विट्रियस" (Vitreous) कहा जाता है। यह आंख के लेंस और रेटिना के बीच की जगह को भरता है। उम्र बढ़ने या अन्य कारणों से इस जेली में बदलाव आने लगते हैं। इसके अंदर मौजूद कोलेजन फाइबर आपस में गुच्छों के रूप में इकट्ठा होने लगते हैं। जब रोशनी इन फाइबरों से होकर गुजरती है, तो उनकी छाया रेटिना पर पड़ती है, जो हमें फ्लोटर्स के रूप में दिखाई देती है।
कम उम्र के लोगों में क्यों बढ़ रहे हैं मामले
पहले आई फ्लोटर्स को बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था, लेकिन अब युवाओं और यहां तक कि किशोरों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। आंखों के डॉक्टरों का कहना है कि इसका एक प्रमुख कारण मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष (माइनस नंबर) है। जिन लोगों की आंखों का नंबर ज्यादा होता है, उनमें रेटिना कमजोर होने, उसमें छेद बनने या रेटिना डिटेचमेंट जैसी समस्याओं का खतरा भी अधिक रहता है। इसके अलावा बढ़ता स्क्रीन टाइम और बाहर कम समय बिताना भी आंखों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि स्क्रीन सीधे फ्लोटर्स पैदा नहीं करती, लेकिन लंबे समय तक स्क्रीन देखने से पहले से मौजूद फ्लोटर्स ज्यादा स्पष्ट नजर आने लगते हैं।
इन परिस्थितियों में बढ़ सकता है खतरा
कुछ शारीरिक गतिविधियां भी आंख के अंदर मौजूद विट्रियस पर असर डाल सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भारी वजन उठाना, लगातार तेज खांसी आना, बार-बार जोरदार छींकें आना या कब्ज के दौरान अत्यधिक जोर लगाना कुछ मामलों में पोस्टेरियर विट्रियस डिटैचमेंट को ट्रिगर कर सकता है। इसके अलावा आंख में चोट लगना या किसी प्रकार का ट्रॉमा भी रेटिना को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे फ्लोटर्स की समस्या बढ़ सकती है।

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कब समझें कि मामला गंभीर हो सकता है
अधिकतर फ्लोटर्स सामान्य होते हैं और इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन कुछ चेतावनी संकेत ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि अचानक बड़ी संख्या में नए फ्लोटर्स दिखाई देने लगें, आंखों के सामने बिजली चमकने जैसी फ्लैश महसूस हो, या नजर के किसी हिस्से पर पर्दे जैसी छाया आने लगे, तो यह रेटिना में गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे लक्षण रेटिना टियर या रेटिना डिटेचमेंट जैसी स्थितियों से जुड़े हो सकते हैं, जिनका समय पर इलाज न किया जाए तो स्थायी रूप से दृष्टि प्रभावित हो सकती है।
रेटिना डिटेचमेंट क्यों है खतरनाक
रेटिना आंख के पीछे मौजूद वह संवेदनशील परत होती है, जो प्रकाश को ग्रहण कर मस्तिष्क तक दृश्य संकेत पहुंचाती है। जब रेटिना अपनी सामान्य स्थिति से अलग होने लगती है, तो इसे रेटिना डिटेचमेंट कहा जाता है। यह एक मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है और समय पर उपचार न मिलने पर व्यक्ति की दृष्टि हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है।

क्या हर फ्लोटर का इलाज जरूरी है
डॉक्टरों का कहना है कि यदि रेटिना पूरी तरह स्वस्थ है और उसमें कोई छेद या डिटेचमेंट नहीं है, तो अधिकांश मामलों में केवल नियमित निगरानी ही पर्याप्त होती है। समय के साथ मस्तिष्क फ्लोटर्स को नजरअंदाज करना सीख जाता है और व्यक्ति को वे कम महसूस होने लगते हैं। हालांकि यदि जांच में रेटिना टियर, रेटिना में छेद या रेटिना डिटेचमेंट की पुष्टि होती है, तो डॉक्टर लेजर उपचार या सर्जरी की सलाह दे सकते हैं।
क्या आई एक्सरसाइज या सप्लीमेंट्स फ्लोटर्स खत्म कर सकते हैं
विशेषज्ञों के अनुसार बाजार में मिलने वाले कई उत्पाद और दावे यह कहते हैं कि विशेष विटामिन, सप्लीमेंट्स या आंखों की एक्सरसाइज से फ्लोटर्स खत्म हो सकते हैं, लेकिन इसके समर्थन में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए ऐसे दावों पर आंख मूंदकर भरोसा करने से बचना चाहिए और किसी भी समस्या के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होता है।
आंखों को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें
आंखों की नियमित जांच कराएं, विशेषकर यदि आपको मायोपिया है या पहले से आंखों की कोई समस्या रही है। लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करते समय बीच-बीच में ब्रेक लें, पर्याप्त समय खुले वातावरण में बिताएं और आंखों को चोट से बचाने के लिए आवश्यक सावधानी बरतें।

