रैबीज बीमारी कितनी खतरनाक? मुंबई के सीनियर अफसर ने डर के चलते दी जान
punjabkesari.in Tuesday, Feb 24, 2026 - 12:04 PM (IST)
नारी डेस्क: मुंबई के पास कल्याण में एक बैंक में सीनियर पोस्ट पर काम करने वाले अफसर एस. विश्वनाथ अमीन ने आवारा कुत्ते के काटने के बाद रैबीज बीमारी का डर महसूस कर, अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना कल्याण ईस्ट के तिसगांव नाका स्थित सहजीवन सोसायटी की है। कुछ दिन पहले उन्हें एक आवारा कुत्ते ने काटा था। इसके बाद उन्होंने रैबीज का इंजेक्शन (वैक्सीन) लगवाया था, लेकिन फिर भी वह गहरे मानसिक तनाव में थे। उन्हें लगातार डर बना रहा कि कहीं उन्हें रैबीज के लक्षण दिखने न लगें। इसी डर और मानसिक दबाव के चलते उन्होंने यह खौफनाक कदम उठा लिया।
स्थानीय प्रशासन की प्रतिक्रिया
शिवसेना (शिंदे गुट) के पार्षद महेश गायकवाड़ ने इस घटना को गंभीरता से लिया और नगर निगम के एडिशनल कमिश्नर हर्षल गायकवाड़ से मुलाकात कर आवारा कुत्तों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की।
मुंबई के एक सीनियर बैंक अफसर ने आवारा कुत्ते के काटने के बाद रैबीज का डर महसूस कर आत्महत्या कर ली। सही वैक्सीन लगवाने के बावजूद मानसिक तनाव और डर ने उनकी जिंदगी पर भारी पड़ गया।
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रैबीज बीमारी कितनी खतरनाक है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रैबीज घातक बीमारी जरूर है, लेकिन PEP (Post Exposure Prophylaxis) यानी सही वैक्सीन कोर्स लेने पर पूरी तरह से इससे बचा जा सकता है। मानसिक डर कई बार बीमारी से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर से परामर्श और काउंसिलिंग बहुत जरूरी है। रैबीज के संक्रमण के बाद लक्षण दिखने में आमतौर पर 1 से 3 महीने का समय लग सकता है। एक बार लक्षण दिखने लगें, तो बीमारी गंभीर हो सकती है। रैबीज सीधे दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर हमला करती है। जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।
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रैबीज बीमारी के शुरुआती लक्षण
रैबीज के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है
काटने वाली जगह पर खुजली, जलन, चुभन या सुन्नपन महसूस होना। हल्का बुखार और सिरदर्द। भूख न लगना, गले में खराश, थकान और मांसपेशियों में दर्द। इन शुरुआती संकेतों के दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और वैक्सीन कोर्स पूरा करना चाहिए। रैबीज घातक बीमारी है, लेकिन समय पर वैक्सीन लगवाने और सावधानी रखने से यह पूरी तरह टाली जा सकती है। मानसिक डर और तनाव को हल्के में न लें, क्योंकि कई बार डर ही घातक साबित हो सकता है। जागरूकता, समय पर इलाज और काउंसिलिंग जीवन बचाने में मदद कर सकते हैं।

