घर-घर में बनने वाली इस दाल को माना जाता है मांसाहारी! मंदिरों में बैन

punjabkesari.in Tuesday, Apr 21, 2026 - 11:02 AM (IST)

नारी डेस्क:  भारतीय रसोई में दालों का खास स्थान है और इन्हें प्रोटीन का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है, खासकर शाकाहारी लोगों के लिए। हम बचपन से यह भी  सुनते और खाते आ रहे हैं की दाले  शाकाहारी होती हैं पर क्या आपको पता हैं की एक दाल ऐसी भी हैं जिसे हिन्दू धर्म में जिसे तामसिक , मांसाहारी माना जाता हैं ,चालिए आज आपको इस आर्टिकल के जारिए बताते हैं की ऐसी कौन सी दाल हैं जिसे हिन्दू धर्म में मांसाहारी माना जाता हैं।     

तामसिक आहार में क्यों गिनी जाती है मसूर दाल?

हिंदू धर्म में भोजन को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है सात्विक आहार, राजसिक आहार और तामसिक आहार। सात्विक भोजन को शुद्ध और मन को शांत रखने वाला माना जाता है, जबकि तामसिक भोजन को आलस्य और नकारात्मकता बढ़ाने वाला बताया गया है। कई मान्यताओं के अनुसार मसूर दाल तामसिक श्रेणी में आती है, इसलिए इसे पूजा-पाठ, व्रत और मंदिरों के भोग में शामिल नहीं किया जाता।

PunjabKesari

मंदिरों और व्रत-उपवास में क्यों नहीं होता इस्तेमाल?

देश के कई मंदिरों और धार्मिक परंपराओं में मसूर दाल का उपयोग पूरी तरह से वर्जित है। खासकर वैष्णव परंपरा से जुड़े लोग इसे अपने भोजन में शामिल नहीं करते, विशेष रूप से व्रत या त्योहारों के दौरान। कुछ समुदाय इसे प्याज और लहसुन की तरह मानते हैं, जिन्हें भी तामसिक माना जाता है। यही वजह है कि धार्मिक आयोजनों में इससे दूरी बनाए रखी जाती है।

पौराणिक कथा से जुड़ा है तामसिक होने का कारण

मसूर दाल को लेकर एक पौराणिक कथा भी काफी प्रचलित है, जिसमें कामधेनु का जिक्र मिलता है। कथा के अनुसार, ऋषि जमदग्नि की दिव्य गाय कामधेनु को सहस्त्रार्जुन (जिन्हें कार्तवीर्य अर्जुन भी कहा जाता है) जबरन ले जाना चाहते थे। संघर्ष के दौरान कामधेनु घायल हो गईं और जहां-जहां उनका रक्त गिरा, वहां मसूर के पौधे उग आए। इसी कथा के आधार पर कुछ लोग मानते हैं कि रक्त से उत्पन्न होने के कारण यह दाल शुद्ध नहीं है और इसे मांसाहारी के समान माना जाता है। कुछ परंपराओं में मसूर दाल का इस्तेमाल तांत्रिक क्रियाओं या विशेष अनुष्ठानों में भी किया जाता है। इसी कारण सात्विक पूजा-पाठ में इसे शामिल नहीं किया जाता। खासकर बंगाल और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में इसे लेकर अलग मान्यताएं देखने को मिलती हैं।

PunjabKesari

ये भी पढ़ें:   हर दिन आपके घर आते हैं भगवान? ये 7 संकेत दिखें तो समझ जाएं

आयुर्वेद क्या कहता है?

आयुर्वेद के अनुसार मसूर दाल की प्रकृति ‘उष्ण’ मानी जाती है, यानी यह शरीर में गर्मी और उत्तेजना बढ़ा सकती है। आयुर्वेद के अनुसार जो लोग साधना, ध्यान या आध्यात्मिक जीवन जीते हैं, उन्हें ऐसे खाद्य पदार्थों से बचने की सलाह दी जाती है जो मन को विचलित कर सकते हैं। यही कारण है कि कई संत और साधु इस दाल का सेवन नहीं करते।

पोषण के मामले में किसी से कम नहीं

हालांकि धार्मिक मान्यताओं से अलग, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो मसूर दाल प्रोटीन, फाइबर, आयरन और कई जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होती है। यह शरीर के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती है और संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

PunjabKesari

मान्यता और विज्ञान के बीच संतुलन

मसूर दाल को लेकर समाज में अलग-अलग मान्यताएं मौजूद हैं। जहां एक ओर कुछ लोग धार्मिक कारणों से इसका सेवन नहीं करते, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग इसे अपने रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा बनाते हैं। यह पूरी तरह व्यक्ति की आस्था और सोच पर निर्भर करता है कि वह इसे अपनाता है या नहीं।


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Priya Yadav

Related News

static