मोबाइल लत से परेशान Parents रख रहे बाउंसर , 24 घंटे निगरानी पर 65000 महीने तक कर रहे खर्च

punjabkesari.in Wednesday, May 06, 2026 - 05:52 PM (IST)

नारी डेस्क: गुजरात में एक चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है, जहां माता-पिता अपने टीनएजर बच्चों की मोबाइल और नशे की लत से इतने परेशान हो चुके हैं कि अब उन्होंने उनकी 24 घंटे निगरानी के लिए बाउंसर तक रखने शुरू कर दिए हैं। यह कदम सुनने में भले ही असामान्य लगे, लेकिन कई परिवारों के लिए यह मजबूरी बनता जा रहा है, जहां हालात हिंसा और बेकाबू व्यवहार तक पहुंच चुके हैं।

6 साल की लड़की के लिए 4 बाउंसर तैनात

अहमदाबाद में एक 16 साल की लड़की के माता-पिता ने उसकी सुरक्षा और निगरानी के लिए दो शिफ्ट में चार बाउंसर रखे हैं। इस व्यवस्था पर वे हर महीने करीब 65,000 रुपये खर्च कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि लड़की सोशल मीडिया और मोबाइल फोन की इतनी आदी हो गई थी कि फोन छीनने पर वह आक्रामक हो जाती थी।

सोशल मीडिया की लत और बढ़ता खतरा

मनोचिकित्सकों के अनुसार, लड़की एक फोटो-शेयरिंग ऐप की आदी हो चुकी थी और लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करने के साथ-साथ अनजान लोगों से बातचीत करती थी। धीरे-धीरे वह अपने ऑनलाइन दोस्तों से मिलने के लिए घर से बाहर निकलने लगी, जिससे परिवार की चिंता और बढ़ गई। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब फोन छीनने की कोशिश पर लड़की ने घर में हिंसक व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने गुस्से में टीवी और माइक्रोवेव जैसी चीजें बालकनी से नीचे फेंक दीं और अपनी मां पर भी हमला कर दिया। इसके बाद परिवार ने डॉक्टर की सलाह पर सख्त निगरानी के लिए बाउंसर रखने का फैसला किया।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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सूरत में कुत्ते पर गुस्सा निकालने वाला मामला

सूरत में एक और मामले में 17 साल के लड़के की गेमिंग और गुस्से की लत इतनी बढ़ गई कि वह अपने पालतू कुत्ते को पीटने लगा। हालात इतने बिगड़ गए कि परिवार ने कुत्ते की सुरक्षा के लिए भी बाउंसर तैनात कर दिए। यह व्यवस्था करीब नौ महीने तक दो शिफ्ट में चलती रही।

नशे की लत से जूझते किशोरों पर बढ़ रही निगरानी

सिक्योरिटी एजेंसियों के अनुसार अब केवल सेलिब्रिटी या बड़े इवेंट्स ही नहीं, बल्कि सामान्य परिवार भी अपने बच्चों की निगरानी के लिए बाउंसर हायर कर रहे हैं। कुछ मामलों में ऐसे किशोर शामिल हैं जो ड्रग्स या शराब की लत से जूझ रहे हैं और इलाज के बाद भी निगरानी की जरूरत महसूस की जा रही है।

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रोजाना हजारों रुपये तक का खर्च

एजेंसियों के मुताबिक, बाउंसर सेवाओं का खर्च शिफ्ट के हिसाब से लगभग 1,000 से 5,000 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच जाता है। कई परिवार इस व्यवस्था पर हर महीने 50,000 से 65,000 रुपये तक खर्च कर रहे हैं, ताकि उनके बच्चे किसी भी गलत आदत या जोखिम भरे व्यवहार से दूर रहें। अब एजेंसियां अपने स्टाफ को यह भी ट्रेनिंग दे रही हैं कि बच्चों के साथ सख्ती के बजाय नरमी से पेश आया जाए। कई मामलों में बाउंसरों को यह जिम्मेदारी दी जाती है कि वे बच्चों को अकेला न छोड़ें और उन्हें किसी भी गलत गतिविधि से दूर रखें। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड के बाद से किशोरों में मोबाइल और ड्रग्स की लत के मामले तेजी से बढ़े हैं। कई बच्चों को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए लंबी काउंसलिंग और अस्पताल में इलाज तक की जरूरत पड़ रही है।
  


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Content Editor

Priya Yadav

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