क्या रबड़ी और जलेबी खाने से भी हो सकता है लकवा?  33 साल के शख्स की कहानी सुन रह जाओगे हैरान

punjabkesari.in Tuesday, Apr 21, 2026 - 02:41 PM (IST)

नारी डेस्क:  भारतीयों के भोजन के बाद पसंदीदा मिठाइयों में जलेबी, रसगुल्ला, गुलाब जामुन जैसे शीर्ष पर हैं, जो स्वाद और परंपरा का मेल हैं। मठाई खाने का आनंद तब बर्बाद हो जाता है जब इस तरह के खान-पान की वजह से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो जाती हैं खासकर तब, जब समस्या लकवे (paralysis) जितनी गंभीर हो। ठीक ऐसा ही हुआ हैदराबाद के रहने वाले 33 साल के शख्स के  साथ जिनको जलेबी-रबड़ी ने उम्र भर का रोग दे दिया। दरअसल यह शख्स जब भी जलेबी-रबड़ी खाता था तो उसके हाथ-पैर कमज़ोर पड़ जाते थे, जिससे वह कई घंटों तक बिस्तर पर पड़ा रहते थे और उन्हें लकवा जैसा महसूस होता था। हैदराबाद के अपोलो हॉस्पिटल्स में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार ने एक्स पर इस शख्स की बीमारी के बारे में विस्तार से बताया। 

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डॉक्टर ने बताई पूरी बात

 डॉ. सुधीर कुमार ने  ट्वीट में कहा- "मुझे किसी मेडिकल समस्या का शक था, इसलिए मैंने उनसे रबड़ी-जलेबी खाने के कुछ घंटों बाद अस्पताल वापस आने को कहा। जब वह वापस आए, तो जाच करने पर पता चला कि उनके हाथों और पैरों में कमज़ोरी आ गई थी। वह उकड़ू बैठने की स्थिति से उठ नहीं पा रहे थे। वह अपने हाथ ऊपर नहीं उठा पा रहे थे। उनकी बोलने और निगलने की क्षमता सामान्य थी। उन्हें मांसपेशियों में कोई दर्द नहीं था। उन्हें कोई सुन्नपन महसूस नहीं हो रहा था और उनका ब्लैडर पर नियंत्रण भी सामान्य था।" डॉ. सुधीर कुमार ने कहा- “मैंने एक ब्लड टेस्ट करवाने को कहा। सीरम पोटैशियम का स्तर 2.8 mEq/L पाया गया (सामान्य स्तर 3.5-5 mEq/L होता है)। इस चरण पर क्लिनिकल डायग्नोसिस 'हाइपोकैलेमिक पीरियोडिक पैरालिसिस' (HPP) था।” 


क्या है HPP

हाइपोकैलेमिक पीरियोडिक पैरालिसिस (HPP) एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार है जो मांसपेशियों को प्रभावित करता है और मांसपेशियों में कमज़ोरी या लकवे (पैरालिसिस) के दौरे पड़ने का कारण बनता है। इसे “हाइपोकैलेमिक” इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके दौरे रक्त में पोटैशियम के स्तर में कमी से जुड़े होते हैं। डॉक्टर न बताया-  “कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन (स्टार्च वाले खाद्य पदार्थ) का सेवन करने से, हाइपोकैलेमिक पीरियोडिक पैरालिसिस की प्रवृत्ति वाले लोगों में पोटैशियम का स्तर कम हो सकता है। ऐसा भोजन के बाद इंसुलिन के स्तर में अचानक हुई बढ़ोतरी (इंसुलिन सर्ज) के कारण होता है; इसके परिणामस्वरूप कोशिकाओं द्वारा पोटैशियम का अवशोषण बढ़ जाता है, जिससे सीरम पोटैशियम का स्तर कम हो जाता है।” 

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इस कारण श्ख्स का हुआ ये हाल

आगे की जांच करने पर डॉक्टर को पता चला कि शख्स की पल्स रेट बहुत ज़्यादा थी (110/मिनट), आंखें बाहर की ओर निकली हुई थीं  और गर्दन के आगे के हिस्से में सूजन थी। आख़िर में हाइपोकैलेमिक पीरियोडिक पैरालिसिस के साथ हाइपरथायरॉइडिज़्म की बीमारी का पता चला। हाइपरथायरॉइडिज़्म एक ऐसी स्थिति है जिसमें थायरॉइड ग्लैंड बहुत ज़्यादा थायरॉइड हार्मोन बनाती है, जिससे मेटाबॉलिज़्म बहुत ज़्यादा तेज़ हो जाता है। कुछ मामलों में, हाइपरथायरॉइडिज़्म की वजह से HPP हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि थायरॉइड हार्मोन का लेवल ज़्यादा होने पर कोशिकाएं ज़्यादा मात्रा में पोटैशियम सोख लेती हैं, जिससे खून में पोटैशियम का लेवल कम हो जाता है। इसकी वजह से, HPP से पीड़ित लोगों में मांसपेशियों में कमज़ोरी या पैरालिसिस के दौरे पड़ सकते हैं। HPP के साथ हाइपरथायरायडिज्म के इलाज में, दोनों स्थितियों को अलग-अलग मैनेज करना शामिल हो सकता है।


नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है और पेशेवर चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है।
 


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Content Writer

vasudha

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