National Girl Child Day: बॉलीवुड की हसीनाओं ने दुनिया को बताया लड़की होना कमजोरी नहीं ताकत है
punjabkesari.in Friday, Jan 23, 2026 - 07:43 PM (IST)
नारी डेस्क: हिंदी सिनेमा में एक समय था जब ‘लड़की होना' सीमाओं और समझौतों से जुड़ा माना जाता था। लेकिन कुछ अभिनेत्रियां ऐसी रहीं जिन्होंने अपने किरदारों, सोच और बेबाकी से यह परिभाषा ही बदल दी और यह साबित किया कि संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और साहस का ही दूसरा नाम है। विद्या बालन ने यह मिथक तोड़ा कि हीरोइन बनने के लिए एक तय ढांचा ज़रूरी है।‘कहानी‘,‘द डर्टी पिक्चर'और ‘शेरनी' जैसी फिल्मों में उन्होंने आत्मनिर्भर, मजबूत और सोचने वाली स्त्री को बिना किसी समझौते के केंद्र में रखा।

काजोल ने 90 के दशक में ही सशक्त महिला किरदारों को मुख्यधारा में जगह दिलाई।‘दुश्मन' और ‘फना' जैसी फिल्मों में उनकी भावनात्मक ताक़त और निर्णय लेने की क्षमता ने यह दिखाया कि मां, प्रेमिका या पत्नी, हर रूप में स्त्री मज़बूत हो सकती है। रानी मुखर्जी ने‘ब्लैक‘,‘मर्दानी' और‘हिचकी' जैसी फिल्मों में स्त्री शक्ति को नई परिभाषा दी। उनके किरदार नेतृत्व, करुणा और द्दढ़ संकल्प का प्रतीक बने, जहां‘ लड़की होना' खुद में एक ताक़त बनकर उभरा। ‘क्वीन' से लेकर ‘तनु वेड्स मनु' तक, कंगना रनौत ने ऐसी महिलाओं को परदे पर जिया, जो खुद अपनी ज़दिंगी की दिशा तय करती हैं। उनकी बेबाकी ने ‘लड़की होना' को निडरता और आत्मनिर्भरता की पहचान दी।

धड़क' से लेकर ‘गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल' और ‘मिली' जैसी फिल्मों में जान्हवी कपूर ने उन किरदारों को चुना जो भावनात्मक रूप से मज़बूत हैं, डर से लड़ते हैं और हालात के आगे झुकते नहीं। ‘गुंजन सक्सेना' में उन्होंने यह दिखाया कि एक लड़की का सपना आसमान छू सकता है, जबकि ‘मिली' में सर्वाइवल और मानसिक द्दढ़ता को बेहद सादगी से पेश किया। आलिया भट्ट ने कम उम्र में ही यह साबित कर दिया कि भावनात्मक गहराई भी एक बड़ी ताक़त है।‘हाईवे‘,‘राज़ी'और‘गंगूबाई काठियावाड़ी'में उनके किरदार संवेदनशील होते हुए भी बेहद मज़बूत नजर आते हैं। दीपिका ने‘छपाक'और‘पद्मावत'जैसी फिल्मों के ज़रिए साहस, गरिमा और आत्मसम्मान की मिसाल पेश की। मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात कर, वे असल ज़दिंगी में भी लाखों लड़कियों के लिए सशक्त आवाज़ बनीं।

प्रियंका चोपड़ृा ने भारतीय सिनेमा की सीमाओं से बाहर निकलकर ग्लोबल मंच पर अपनी ज़बरदस्त पहचान बनाई। साथ ही ‘मैरी कॉम' जैसी फिल्म के ज़रिये यह भी दिखाया कि एक लड़की सपने देखने और उन्हें पूरा करने की पूरी हक़दार है और वो चाहे तो कुछ भी कर सकती है। ‘पिंक'और‘थप्पड़'जैसी फिल्मों में तापसी पन्नू ने उस स्त्री को आवाज़ दी, जो चुप नहीं रहती, सवाल करती है और अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ी होती है। इन सभी अभिनेत्रियों ने अपने-अपने दौर में यह साबित किया कि स्त्री को परिभाषित करने का हक़ सिर्फ उसी का है। ऐसे में आज हिंदी सिनेमा की महिला सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि कहानी की दिशा तय करने वाली शक्ति है, क्योंकि अब‘लड़की होना 'कमजोरी नहीं, बल्कि ताक़त है।

