बचपन में खोए पैर पर हिम्मत नहीं ...  बास्केटबॉल प्लेयर साक्षी अपनी कहानी से दूसरों को दी रही हौंसला

punjabkesari.in Wednesday, Aug 12, 2026 - 06:53 PM (IST)

नारी डेस्क: कहते हैं कि खेल खेलने से जीवन के कई सबक सीखे जा सकते हैं। यह बात सच है क्योंकि ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जिन्होंने खेलों से जीवन के सबक सीखकर ज़िंदगी में कामयाबी हासिल की और अपनी पहचान बनाई। ऐसी ही  प्रेरणादायक कहानी है उत्तराखंड की साक्षी चौहान की, जिन्होंने व्हीलचेयर बास्केटबॉल खेलकर जीवन के प्रति एक सकारात्मक नजरिया अपनाया। सालों पहले साक्षी एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गईं थी।  इसके बाद जो उन्होंने पाया वह उनसे कोई नहीं छीन सकता, वह था आत्मविश्वास, साहस और सहनशक्ति। 

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8 साल की उम्र में साक्षी का साथ हुआ हादसा

 गढ़वाल के टिहरी में रहने वाली साक्षी किसी आम दिन की तरह ही बाज़ार गई थीं, सड़क पार करते समय एक बस ने उन्हें टक्कर मार दी और बस के पहिए उनके पैरों के ऊपर से गुज़र गए। निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली साक्षी उस समय सिर्फ़ 8 साल की थीं, जब यह घटना हुई और उनके दोनों पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। अस्पताल में तीन महीने रहने के बाद जब वह घर लौटी तो पूरी तरह से टूट गई थी। उस वक्त डॉक्टर ने उनके माता- पिता से कहा था-  “आपकी बेटी शायद ज़िंदगी भर अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएगी और आपको ही उसकी देखभाल करनी होगी।” अब साक्षी अपने दम पर इतनी मजबूती से खड़ी हैं कि कोई उनके कदमों को लड़खड़ा नहीं सकता है। 


साक्षी ने सुनाई फैन की कहानी

लाइफ़ कोच रितु सिंघल के साथ 'ज़िंदगी टॉक्स' के इस एपिसोड में इंटरनेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल खिलाड़ी साक्षी चौहान ने अपनी उस अद्भुत यात्रा के बारे में बात की जिसमें उन्होंने ज़िंदगी बदलने वाली मुश्किलों का सामना करते हुए इंटरनेशनल स्टेज पर टीम इंडिया का गर्व से प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान वह उस फैन को याद कर भावुक हो गई जिसने साक्षी की तरह एक हादसे में अपने पैंरों को खो दिया था। साक्षी ने बताया कि उन्होंने विभा नाम की उस लड़की के घर जाकर उसे हिम्मत दी और उसे बताया कि जिंदगी खत्म नहीं हुई है। वह कहती हैं उन्हें देखकर विभा के मां को हौंसला आ गया कि उनकी बेटी भी एक दिन ऐसी ही हिम्मत दिखाएगी और दुनिया का डटकर सामना करेगी।  साक्षी के अनुसार वह लड़की अब इस दुनिया में नहीं है, अगर वह होती ताे कहीं अच्छे Platform में होती। 

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साक्षी में थी खुद पर भरोसा रखने की हिम्मत

साक्षी की बात करें तो अकल्पनीय चुनौतियों का सामना करने के बाद भी उन्हाेंने अपनी विकलांगता को अपने भविष्य का आधार नहीं बनने दिया। इसके बजाय उन्होंने अपने दर्द को एक मकसद में बदल दिया और यह साबित किया कि असली ताकत खुद पर भरोसा करने से आती है, तब भी जब ज़िंदगी नामुमकिन लगने लगे। उनके ये यादगार शब्द - "मैं सिर्फ़ चलने के लिए नहीं, बल्कि उड़ने के लिए पैदा हुई हूं" - हर उस सपने देखने वाले की भावना को दर्शाते हैं जो हार मानने से इनकार करता है। उनकी ये बातें  डर पर काबू पाने, आत्मविश्वास बढ़ाने, चुनौतियों को स्वीकार करने, मानसिक मज़बूती, लगन, प्रेरणा और नामुमकिन सपनों को पूरा करने जैसे जीवन के ज़रूरी सबक सिखाती है।
 


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Content Writer

vasudha

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