Amitabh Bachchan: दोस्त के लिए राजनीति में आए थे बिग बी, फिर क्यों छोड़ दी सियासत...
punjabkesari.in Sunday, Oct 11, 2026 - 12:51 PM (IST)
नारी डेस्क : बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी शानदार अदाकारी से कई दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया है। फिल्मों में उन्होंने कभी आम आदमी की आवाज बनकर अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी, तो कभी अपने दमदार अभिनय से ऐसे किरदार निभाए, जिन्हें आज भी याद किया जाता है। लेकिन असल जिंदगी में जब उन्होंने राजनीति की दुनिया में कदम रखा, तो उनका अनुभव फिल्मी पर्दे से बिल्कुल अलग रहा। अपने करीबी दोस्त राजीव गांधी का साथ देने के लिए राजनीति में आए अमिताभ बच्चन की यह पारी ज्यादा लंबी नहीं चली। विवादों और मुश्किलों के बीच उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया और फिर राजनीति से दूरी बना ली। 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन के जन्मदिन के मौके पर आइए जानते हैं, आखिर ऐसा क्या हुआ था कि सिनेमा की दुनिया में अपार सफलता हासिल करने वाले महानायक ने राजनीति से किनारा कर लिया था।
दोस्त राजीव गांधी के समर्थन में राजनीति में आए थे अमिताभ
अमिताभ बच्चन का जन्म 11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि थे। अमिताभ ने फिल्मों में अपनी मेहनत और अभिनय के दम पर अलग पहचान बनाई। हालांकि, साल 1984 में उन्होंने अपने करियर की दिशा बदलते हुए राजनीति में कदम रखा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में अमिताभ बच्चन ने अपने करीबी दोस्त राजीव गांधी का समर्थन किया। वह कांग्रेस के टिकट पर इलाहाबाद लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को बड़े अंतर से हराया। फिल्मों में अपनी लोकप्रियता के कारण अमिताभ बच्चन को जनता का जबरदस्त समर्थन मिला। उनकी जीत ने राजनीतिक गलियारों में भी खूब चर्चा बटोरी। हालांकि, राजनीति में उनका सफर उतना आसान नहीं रहा, जितनी उम्मीद की जा रही थी।
बोफोर्स विवाद में आया नाम, बढ़ीं मुश्किलें
अमिताभ बच्चन की राजनीतिक पारी को सबसे बड़ा झटका साल 1987 में लगा, जब बोफोर्स मामले के दौरान उनका और उनके भाई अजिताभ बच्चन का नाम विवाद में आया। इस मामले में कथित तौर पर रिश्वत और विदेशी खातों से जुड़े आरोपों की चर्चाएं हुईं। अमिताभ बच्चन ने इन आरोपों को खारिज किया था। विवाद के दौरान उन्हें मीडिया और राजनीतिक विरोधियों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। बाद में उनके खिलाफ लगे आरोप साबित नहीं हुए और साल 2012 में उन्हें इस मामले में क्लीन चिट मिलने की खबर सामने आई। हालांकि, उस दौर के विवादों ने उनकी राजनीतिक पारी को गहरा झटका दिया था।आखिरकार, जुलाई 1987 में अमिताभ बच्चन ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति में दोबारा कदम नहीं रखा
राजनीति में भावनाओं की जगह नहीं
अमिताभ बच्चन ने अलग-अलग मौकों पर राजनीति में आने और उसे छोड़ने के अपने फैसले पर खुलकर बात की है। साल 2016 में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वीकार किया था कि राजनीति में आने का उनका फैसला भावनात्मक था। वह अपने दोस्त की मदद करना चाहते थे, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि राजनीति भावनाओं के आधार पर नहीं चलती। उन्होंने कहा था, मेरा फैसला भावनात्मक था। मैं एक दोस्त की मदद करना चाहता था, इसलिए राजनीति में आया। लेकिन वहां जाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि राजनीति का भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है। मुझे लगा कि मैं यह नहीं कर सकता, इसलिए मैंने राजनीति छोड़ दी। अमिताभ ने यह भी माना था कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने इलाहाबाद के लोगों से कई वादे किए थे, जिन्हें वह पूरा नहीं कर सके। इस बात का उन्हें अफसोस रहा। उन्होंने कहा था कि लोगों से किए गए वादे पूरे न कर पाना उनके लिए दुख की बात है।
राजनीति से दूर रहे अमिताभ, जया बच्चन ने जारी रखा सफर
अमिताभ बच्चन ने राजनीति छोड़ने के बाद अपना ध्यान फिर से फिल्मों और अभिनय पर केंद्रित कर लिया। हालांकि, उनके परिवार का राजनीति से जुड़ाव बना रहा। उनकी पत्नी जया बच्चन समाजवादी पार्टी से जुड़ीं और राज्यसभा सदस्य के रूप में राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहीं। अमिताभ बच्चन के लिए राजनीति का अनुभव उनके फिल्मी करियर से बिल्कुल अलग साबित हुआ।

