2000 साल पुराना माना जाता है ये मंदिर, आज भी होती है पूजा; अनोखी है यहां की परंपरा

punjabkesari.in Wednesday, Aug 19, 2026 - 01:27 PM (IST)

नारी डेस्क: भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं और उनका इतिहास सदियों पुराना है। बिहार के कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी देवी मंदिर भी ऐसा ही एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। पहाड़ी पर बना यह मंदिर अपनी पुरानी वास्तुकला, धार्मिक मान्यताओं और लगातार होती पूजा के लिए खास पहचान रखता है। बिहार पर्यटन के मुताबिक, इसे दुनिया के सबसे पुराने कार्यशील मंदिरों में गिना जाता है और यहां पूजा-पाठ की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। 

कैमूर की पहाड़ी पर बना है मंदिर

मां मुंडेश्वरी मंदिर बिहार के कैमूर जिले में मुंडेश्वरी पहाड़ी पर स्थित है। बिहार पर्यटन के अनुसार, यह मंदिर करीब 608 फीट की ऊंचाई पर है। पहाड़ी और उसके आसपास का प्राकृतिक वातावरण इस जगह को धार्मिक होने के साथ-साथ बेहद खूबसूरत भी बनाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्ते से होकर जाना पड़ता है। ऊपर पहुंचने के बाद आसपास का शांत माहौल और हरियाली इस जगह को बाकी धार्मिक स्थलों से थोड़ा अलग अनुभव देते हैं।

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108 ईस्वी से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

मंदिर की उम्र को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं। बिहार पर्यटन की जानकारी के मुताबिक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मंदिर को 108 ईस्वी का मानता है। इसी वजह से इसे भारत के सबसे प्राचीन कार्यशील हिंदू मंदिरों में शामिल किया जाता है। हालांकि, बिहार पर्यटन के एक अन्य प्रकाशन में इसे दूसरी शताब्दी ईस्वी का मंदिर बताया गया है।  मंदिर को 1915 से संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त है। यानी यह जगह सिर्फ आस्था के लिहाज से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक नजरिए से भी काफी महत्वपूर्ण है। 

अष्टकोणीय आकार है सबसे खास

मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे अलग पहचान इसकी वास्तुकला है। यह मंदिर अष्टकोणीय यानी आठ कोणों वाले आकार में बना हुआ है। बिहार पर्यटन इसे नागर शैली की प्राचीन मंदिर वास्तुकला के महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिनता है। पत्थरों से बने इस मंदिर की बनावट आज भी लोगों का ध्यान खींचती है। मंदिर की प्राचीन संरचना को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में पत्थर की कारीगरी और मंदिर निर्माण की कला कितनी विकसित रही होगी। 

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मां मुंडेश्वरी और भगवान शिव दोनों की होती है पूजा

यह मंदिर सिर्फ देवी की उपासना के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। यहां मां मुंडेश्वरी के साथ भगवान शिव की भी पूजा होती है। मंदिर में चार मुख वाला शिवलिंग यानी चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है, जो इस मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। समय के साथ मंदिर में देवी और शिव की उपासना का स्वरूप भी खास रहा है। बिहार पर्यटन के अनुसार, यहां भगवान विष्णु, सूर्य और गणेश की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। 

यहां की बलि की परंपरा भी है बेहद अलग

मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित धार्मिक परंपराओं में बलि की एक अनोखी प्रथा का जिक्र मिलता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां पशु को देवी के सामने लाकर पूजा की जाती है, लेकिन उसे मारा नहीं जाता। पूजा के बाद पशु को जीवित ही छोड़ दिया जाता है। इसी वजह से इसे कई जगह रक्तहीन बलि की परंपरा के रूप में बताया जाता है। यह परंपरा इस मंदिर को दूसरे शक्ति मंदिरों से अलग पहचान देती है। हालांकि, ऐसी धार्मिक परंपराओं के बारे में स्थानीय मान्यताओं और आधिकारिक मंदिर प्रबंधन की जानकारी को ही आधार मानना उचित है।

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लगातार पूजा होने की वजह से मिली खास पहचान

मंदिर से जुड़ी सबसे खास बात यह है कि यहां लंबे समय से पूजा और धार्मिक अनुष्ठान जारी रहने की मान्यता है। बिहार पर्यटन इसे दुनिया के सबसे पुराने 'फंक्शनल' यानी सक्रिय मंदिर के रूप में प्रसिद्ध बताता है।  हालांकि, '2000 साल से एक दिन भी बंद नहीं हुआ' जैसी बात को ऐतिहासिक तथ्य के बजाय मंदिर से जुड़ी परंपरागत मान्यता के रूप में देखना बेहतर है। इतने लंबे समय के लगातार संचालन का हर दिन का स्वतंत्र ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध होना जरूरी नहीं है।

मलबे में दबा था मंदिर, फिर भी पूजा की परंपरा जारी रही

मंदिर के इतिहास को लेकर यह भी कहा जाता है कि लंबे समय तक यह ढांचा मलबे और प्राकृतिक बदलावों के बीच दबा रहा। बाद के दौर में इसके संरक्षण और जीर्णोद्धार पर काम किया गया। आज यह मंदिर संरक्षित ऐतिहासिक स्थल के रूप में मौजूद है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र, रामनवमी और महाशिवरात्रि जैसे मौकों पर यहां खास भीड़ देखने को मिलती है। 

दिल्ली से कैसे पहुंचें

अगर आप दिल्ली या आसपास के इलाके से मुंडेश्वरी मंदिर जाने की योजना बना रहे हैं तो ट्रेन और फ्लाइट, दोनों विकल्प इस्तेमाल किए जा सकते हैं। नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन भभुआ रोड है। बिहार पर्यटन के मुताबिक, भभुआ से मंदिर तक ऑटो, टैक्सी और स्थानीय परिवहन की सुविधा मिल सकती है, हालांकि मंदिर तक पहुंचने के लिए कुछ दूरी पैदल या पहाड़ी रास्ते से तय करनी पड़ सकती है।  हवाई यात्रा करने वाले लोग वाराणसी के लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंचकर आगे सड़क मार्ग से कैमूर जा सकते हैं। यात्रा से पहले स्थानीय परिवहन और मंदिर के दर्शन समय की ताजा जानकारी जरूर जांच लेना बेहतर रहेगा।

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इतिहास और आस्था का अनोखा मेल

मुंडेश्वरी मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी उम्र नहीं है। यहां प्राचीन वास्तुकला, शिव और शक्ति की उपासना, पहाड़ी का प्राकृतिक वातावरण और सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं एक साथ देखने को मिलती हैं। यही वजह है कि यह जगह श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी खास आकर्षण रखती है।  

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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