10 दिनों तक मिट्टी के रूप में क्यों विराजते हैं बप्पा? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा
punjabkesari.in Friday, Sep 18, 2026 - 03:41 PM (IST)
नारी डेस्क : गणेश चतुर्थी आते ही चारों तरफ 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारे गूंजने लगते हैं। घरों और पंडालों में बप्पा की स्थापना की जाती है और पूरे 10 दिनों तक उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना होती है। इसके बाद अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बप्पा को 10 दिनों तक ही घर में क्यों विराजमान किया जाता है और मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन करने की परंपरा कैसे शुरू हुई? इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं।
गणेश जी 10 दिनों तक मिट्टी के रूप में क्यों रहते हैं?
गणेश उत्सव से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक कथा का संबंध महाभारत के लेखन से बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत जैसा विशाल ग्रंथ लिखने के लिए ऐसे लेखक की जरूरत थी, जो लगातार बिना रुके लिख सके। इसके लिए उन्होंने बुद्धि और विद्या के देवता भगवान गणेश से प्रार्थना की।

बप्पा ने रखी थी एक शर्त
कथा के अनुसार, भगवान गणेश महाभारत लिखने के लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि लिखते समय उनकी कलम एक पल के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए। महर्षि वेदव्यास जी ने भी अपनी ओर से शर्त रख दी कि गणेश जी हर श्लोक का अर्थ पूरी तरह समझने के बाद ही उसे लिखेंगे। इस तरह जब वेदव्यास जी कोई कठिन और गूढ़ श्लोक बोलते, तो गणेश जी उसके अर्थ को समझने में समय लगाते। इसी दौरान वेदव्यास जी अगले श्लोक की रचना कर लेते। मान्यता है कि महाभारत का यह लेखन कार्य लगातार कई दिनों तक चलता रहा।
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लगातार लिखने से बढ़ गई थी शरीर की तपन
पौराणिक कथा के अनुसार, लगातार लेखन करने के कारण भगवान गणेश के शरीर का तापमान बढ़ गया था। उनकी शरीर की तपन कम करने के लिए उनके शरीर पर मिट्टी का लेप लगाया गया। माना जाता है कि इससे गणेश जी को ठंडक मिली। कथा के अनुसार, दसवें दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर महाभारत का लेखन कार्य पूरा हुआ। इसके बाद वेदव्यास जी ने गणेश जी को जल से स्नान कराया, जिससे उनके शरीर को शीतलता मिली। इसी मान्यता को गणेश उत्सव के दौरान मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने और दसवें दिन विसर्जन करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

कैलाश से पृथ्वी लोक आते हैं बप्पा
गणेश उत्सव से जुड़ी एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ था। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक के इन दिनों में बप्पा कैलाश से पृथ्वी लोक पर अपने भक्तों के बीच आते हैं। इन दिनों भक्त गणेश जी को परिवार के सदस्य की तरह मानकर उनकी सेवा करते हैं। उन्हें मोदक, लड्डू और तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। सुबह-शाम आरती और पूजा के साथ भक्त बप्पा से सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
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भारी मन से होता है बप्पा का विसर्जन
दस दिनों तक पूजा और सेवा के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। धार्मिक मान्यता में इसे बप्पा के अपने धाम लौटने से जोड़ा जाता है। भक्त उन्हें विदाई देते हुए 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' का जयकारा लगाते हैं। गणेश विसर्जन भक्तों के लिए भावुक पल होता है। बप्पा को विदा करते समय भक्त अगले वर्ष उनके दोबारा आने की कामना करते हैं और मानते हैं कि गणेश जी अपने साथ उनकी परेशानियां और विघ्न भी लेकर जाते हैं।

