बोलते समय क्यों अटकते हैं कुछ लोग! जानें हकलाने की वजह

punjabkesari.in Friday, Oct 23, 2026 - 11:58 AM (IST)

नारी डेस्क : कई लोग बातचीत करते समय अचानक अटकने लगते हैं, कुछ शब्दों को बार-बार दोहराते हैं या बोलते समय आवाज को खींचते हैं। आम भाषा में इसे हकलाना कहा जाता है। यह समस्या बचपन में शुरू हो सकती है और कुछ लोगों में लंबे समय तक बनी रहती है। हकलाने की वजह से कई बार व्यक्ति दूसरों के सामने बोलने से कतराने लगता है। उसे डर रहता है कि कहीं लोग उसका मजाक न उड़ाएं या उसकी बात को गलत न समझें। धीरे-धीरे इसका असर उसकी सोशल लाइफ, आत्मविश्वास और करियर पर भी पड़ सकता है। हर साल 22 अक्टूबर को International Stuttering Awareness Day मनाया जाता है, ताकि लोगों को हकलाने की समस्या के प्रति जागरूक किया जा सके। आइए, जानते हैं कि हकलाना क्या है, इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं और यह व्यक्ति की जिंदगी को कैसे प्रभावित करता है।

क्या है हकलाने की समस्या?

हकलाना एक तरह की स्पीच यानी बोलने से जुड़ी समस्या है। इसमें व्यक्ति को बोलते समय शब्दों और आवाजों को सहज तरीके से निकालने में परेशानी हो सकती है। AIIMS के प्रोफेसर के मुताबिक, हकलाने में बोलने की सामान्य लय प्रभावित होती है। इसके प्रमुख लक्षण तीन तरह से दिखाई दे सकते हैं।
शब्दों या आवाजों को बार-बार दोहराना: इसमें व्यक्ति किसी शब्द या आवाज को बोलते समय बार-बार दोहराता है। उदाहरण के लिए, किसी शब्द को शुरू करते समय एक ही आवाज कई बार निकालना।
आवाज या शब्द को खींचना: कुछ लोग बोलते समय किसी आवाज को जरूरत से ज्यादा लंबा खींचते हैं। इस वजह से उन्हें पूरा शब्द बोलने में समय लगता है।
बोलते समय अटकना या आवाज न निकलना: कई बार व्यक्ति को लगता है कि वह कुछ बोलना चाहता है, लेकिन आवाज बाहर नहीं निकल पाती। ऐसी स्थिति में बोलने के बीच रुकावट आ सकती है। हकलाने की समस्या हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है। किसी को हल्की परेशानी होती है, जबकि कुछ लोगों को बातचीत, पढ़ाई या काम के दौरान अधिक दिक्कत का सामना करना पड़ता है।

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आखिर किस वजह से हकलाने लगता है व्यक्ति?

हकलाने का कोई एक निश्चित कारण नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे आनुवंशिक और मस्तिष्क से जुड़े कई कारक भूमिका निभा सकते हैं।

परिवार में पहले से हकलाने की समस्या होना

हकलाने में आनुवंशिक कारकों की भूमिका हो सकती है। अगर परिवार में किसी सदस्य को हकलाने की समस्या रही है, तो दूसरे सदस्यों में भी इसकी संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि परिवार में किसी को हकलाने की समस्या होने पर बच्चे को भी यह परेशानी जरूर होगी।

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मस्तिष्क के स्पीच नेटवर्क से जुड़ा अंतर

बोलने की प्रक्रिया में मस्तिष्क के कई हिस्से मिलकर काम करते हैं। इनमें भाषा को समझने, शब्दों को व्यवस्थित करने और बोलने से जुड़ी मांसपेशियों के बीच तालमेल बनाना शामिल है। हकलाने वाले लोगों में इस प्रक्रिया से जुड़े अंतर देखे जा सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति में इसकी वजह एक जैसी नहीं होती।

बचपन में बोलना सीखने का दौर

अक्सर हकलाने की शुरुआत बचपन में होती है, खासकर 2 से 5 साल की उम्र के दौरान, जब बच्चे तेजी से भाषा सीख रहे होते हैं। इस उम्र में कई बच्चे सामान्य रूप से भी शब्द दोहराते हैं या बोलते समय रुकते हैं। कुछ बच्चों में यह परेशानी समय के साथ कम हो जाती है, जबकि कुछ में हकलाना बना रह सकता है। इसलिए अगर बच्चा लगातार हकलाता है या उसे बोलने में परेशानी होती है, तो स्पीच एंड लैंग्वेज थेरेपिस्ट से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

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तनाव और घबराहट का असर

तनाव, घबराहट या किसी के सामने बोलने का दबाव हकलाने को अधिक स्पष्ट कर सकता है। हालांकि, तनाव को हकलाने का एकमात्र कारण मानना सही नहीं है। कई लोगों में हकलाना बिना किसी तनाव के भी होता है।

हकलाने से आत्मविश्वास पर कैसे पड़ता है असर?

हकलाने की समस्या का असर सिर्फ बोलने तक सीमित नहीं रहता। कई बार व्यक्ति को यह चिंता सताने लगती है कि अगर वह बातचीत के दौरान अटक गया, तो सामने वाला उसके बारे में क्या सोचेगा।

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धीरे-धीरे वह नए लोगों से मिलने, समूह में बात करने या किसी कार्यक्रम में अपनी राय रखने से बचने लग सकता है। कुछ लोग फोन पर बात करने या अपना परिचय देने जैसी सामान्य परिस्थितियों में भी असहज महसूस करते हैं।

अगर आसपास के लोग उसका मजाक उड़ाते हैं या बार-बार बोलने के तरीके पर टिप्पणी करते हैं, तो परेशानी और बढ़ सकती है। ऐसे अनुभवों के कारण व्यक्ति खुद को दूसरों से अलग महसूस कर सकता है। हालांकि, हर हकलाने वाले व्यक्ति को आत्मविश्वास से जुड़ी समस्या हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

करियर और नौकरी पर भी पड़ सकता है असर

आज के समय में कम्युनिकेशन स्किल्स को पढ़ाई और करियर में काफी महत्व दिया जाता है। इंटरव्यू, मीटिंग, प्रेजेंटेशन और टीम के साथ बातचीत के दौरान अपनी बात स्पष्ट रूप से रखना जरूरी होता है। ऐसे में हकलाने वाले कुछ लोगों को अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें डर हो सकता है कि इंटरव्यू के दौरान अटकने पर उनकी काबिलियत को कम आंका जाएगा। इसी डर से कुछ लोग अपनी बात रखने से बचते हैं या ऐसे अवसरों से दूरी बना लेते हैं, जिनमें ज्यादा बोलना पड़े। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हकलाने का व्यक्ति की बुद्धिमत्ता, ज्ञान या काम करने की क्षमता से सीधा संबंध नहीं है। सही सहयोग, अनुकूल माहौल और जरूरत के अनुसार स्पीच थेरेपी की मदद से व्यक्ति अपनी कम्युनिकेशन स्किल्स को बेहतर बनाने पर काम कर सकता है।

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क्या हकलाने की समस्या का इलाज संभव है?

स्पीच थेरेपी लें: विशेषज्ञ व्यक्ति की जरूरत के अनुसार बोलने की तकनीकों और संवाद के अभ्यास में मदद कर सकते हैं।
बोलने के लिए पर्याप्त समय दें: बातचीत करते समय जल्दबाजी करने या खुद पर दबाव डालने से बचें।
मजाक बनाने से बचें: हकलाने वाले व्यक्ति की बात बीच में न काटें और उसके बोलने के तरीके पर टिप्पणी न करें।
जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लें: अगर हकलाने के कारण पढ़ाई, काम या रोजमर्रा की बातचीत में परेशानी हो रही है, तो विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
अगर किसी वयस्क को अचानक बोलने में परेशानी शुरू हो जाए, खासकर इसके साथ चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ-पैर में कमजोरी या भ्रम जैसे लक्षण हों, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। अचानक बोलने में बदलाव को केवल हकलाना समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

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हकलाने वाले व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?

हकलाने वाले व्यक्ति को सबसे ज्यादा जरूरत धैर्य, सम्मान और सहयोग की होती है। उसकी बात पूरी होने दें, उसके वाक्य को खुद पूरा करने की कोशिश न करें और उसे धीरे बोलने के लिए बार-बार न टोकें। बातचीत के दौरान सामान्य व्यवहार करें और उसके बोलने के तरीके के बजाय उसकी बात पर ध्यान दें। याद रखें, हकलाना किसी व्यक्ति की पहचान या काबिलियत तय नहीं करता। सही मार्गदर्शन, सहयोग और जरूरत के अनुसार थेरेपी से वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली चुनौतियों को बेहतर ढंग से संभाल सकता है।


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Content Editor

Monika

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