पाकिस्तान की एक रेस ने मिल्खा सिंह को बनाया 'फ्लाइंग सिख', आखिर दम रहा इस बात का अफसोस

2021-06-19T10:54:43.847

देश के पहले ट्रैंक ऐंड फील्ड सुपर स्टार मिल्खा सिंह बीती रात दुनिया को अलविदा कह गए। 91 साल के मिल्खा सिंह कोरोना संक्रमित थे। 5 दिन पहले ही उनकी पत्नी निर्मल कौर का कोरोना की वजह से ही निधन हुआ था। मिल्खा सिंह का चंडीगढ़ में इलाज चल रहा था और 3 जून को ऑक्सीजन लेवल गिरने की वजह से उन्हें  ICU में भर्ती कराया गया था।

परिवार नहीं चाहता था मिल्खा सिंह को मिले आखिरी वक्त में कष्ट

बीती रात जब मिल्खा सिंह की हालत नाजुक होने लगी तो पीजीआई के डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखना होगा लेकिन परिजनों ने मना कर दिया। उन्हें आभास हो गया था कि निर्मल मिल्खा सिंह के जाने के बाह वो ज्यादा दिन तक नहीं जी पाएगे। दरअसल, मिल्खा सिंह का अपनी पत्नी के साथ बहुत लगाव था।  ऐसे में वेंटिलेटर पर उनके जीवन को खींचना ठीक नहीं होता। परिजन अंतिम समय पर चाहते थे कि वे बिना किसी कष्ट के ही शांतिपूर्ण अंतिम यात्रा पर जाएं। हालांकि पीजीआई के डॉक्टर और परिजन लगातार उनकी देखरेख में लगे रहे।

PunjabKesari

शुरू से ही था खेल और देश से लगाव

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक सिख परिवार में हुआ था। मिल्खा सिंह को खेल और देश से बहुत लगाव था इसी वजह से वह बंटवारे के बाद भारत आ गए और भारतीय सेना में शामिल हुए। सेना में वो शामिल तो हो गए लेकिन बाद में खेल में अधिक रूची होने की वजह से उन्होंने क्रॉस कंट्री दौड़ में हिस्सा लिया। जिसमें 400 से ज्यादा सैनिकों ने दौड़ लगाई। मिल्खा सिंह 6वें नंबर पर आए। साल 1958 में मिल्खा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में ट्रैक एंड फील्ड इवेंट में भारत के लिए पहला गोल्ड जीता था। बता दें कि अगले 56 साल तक यह रिकॉर्ड कोई नहीं तोड़ सका।

PunjabKesari

भारत सरकार ने किया पद्मश्री से सम्मानित

साल 1956 में मेलबर्न में आयोजित ओलंपिक खेल में मिल्खा सिंह ने भाग लिया लेकिन सफल नहीं हो पाए लेकिन इससे उनके लिए आगे के कई रास्ते खुल गए। फिर साल उन्होंने 1958 में टोक्यो में आयोजित एशियाई खेलों में 200 मीटर, 400 मीटर की स्पर्धाओं और राष्ट्रमंडल में 400 मीटर की रेस में स्वर्ण पदक जीते। उनकी सफलता को देखते हुए भारत सरकार ने मिल्खा सिंह को पद्मश्री से सम्मानित किया। 2001 में मिल्खा सिंह को भारत सरकार द्वारा अर्जुन पुरस्कार देने की पेशकश की गई, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था

कैसे मिला फ्लाइंग सिख नाम?

मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान में आयोजित एक दौड़ में शानदार प्रदर्शन किया था। उनके प्रदर्शन को देखकर पाकिस्तान के जनरल अयूब खान ने उन्हें 'द फ्लाइंग सिख' नाम दिया। 1960 को रोम में आयोजित समर ओलंपिक में मिल्खा सिंह से 400 मीटर की रेस में 200 मीटर तक सबसे आगे थे, लेकिन इसके बाद उन्होंने अपनी गति धीमी कर दी। रेस में वह चौथे नंबर पर रहे। इसके बाद साल 1964 में उन्होंने एशियाई खेल में 400 मीटर और 4x400 रिले में गोल्ड मेडल जीते।

PunjabKesari

नहीं पूरी हुई अंतिम इच्छा

अपनी 80 अंतरराष्ट्रीय दौड़ों में मिल्खा सिंह ने 77 दौड़ें जीतीं लेकिन रोम ओलंपिक का मेडल हाथ से जाने का गम उन्हें जीवन भर रहा। उनकी आखिरी इच्छा थी कि वह अपने जीते जी किसी भारतीय खिलाड़ी के हाथों में ओलंपिक मेडल देखें लेकिन अफसोस उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

मिल्खा सिंह के जीवन पर बन चुकी है फिल्म

साल 2013 में मिल्खा सिंह के जीवन पर बॉलीवुड फिल्म- भाग मिल्खा भाग बनी थी। मिल्खा सिंह की भूमिका में फरहान अख्तर नजर आए थे।

मिल्खा सिंह की मौत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह व बॉलीवुड स्टार्स ने श्रद्धांजलि दी है।


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

Priya dhir

Recommended News

static