देवता नहीं, राक्षसों का वंशज थे कर्ण?  एक नहीं पास थे 100 कवच...

punjabkesari.in Thursday, Oct 16, 2025 - 12:45 PM (IST)

नारी डेस्क:  महाभारत के महान योद्धा ‘कर्ण’ का किरदार निभाने वाले अभिनेता पंकज धीर का बुधवार को निधन हो गया। बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में उनके द्वारा निभाया गया यह किरदार भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में अमर हो गया। उनकी गहरी आवाज़, गंभीर संवाद और भावनाओं से भरा अभिनय दर्शकों के दिलों में बस गया था।

कर्ण का जन्म – कुंती के विवाह से पहले हुआ चमत्कार

पौराणिक कथाओं के अनुसार, कर्ण का जन्म महारानी कुंती के विवाह से पहले हुआ था। उन्हें यह वरदान ऋषि दुर्वासा से मिला था कि वे किसी भी देवता को आह्वान कर संतान प्राप्त कर सकती हैं। उत्सुकतावश कुंती ने सूर्यदेव को बुलाया और उसी के परिणामस्वरूप कर्ण का जन्म हुआ, जो जन्म से ही दिव्य कवच-कुंडल से सुसज्जित था। समाज की मर्यादा से भयभीत होकर कुंती ने नवजात शिशु को नदी में प्रवाहित कर दिया। आगे चलकर उस बालक का पालन सारथि अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने किया, जिससे उसका नाम पड़ा राधेय कर्ण।

कर्ण के जन्म का रहस्य – पिछले जन्म का पाप

भागवत पुराण के अनुसार, कर्ण का जन्म केवल वरदान का परिणाम नहीं था, बल्कि उसके पिछले जन्म के कर्मों का फल भी था। पिछले जन्म में कर्ण एक राक्षस था, जिसका नाम दुरदुंभ (दम्भोद्भव) था। इस राक्षस ने सूर्यदेव की कठोर तपस्या करके उनसे 100 कवच और दिव्य कुंडल प्राप्त किए थे। इन कवचों की शक्ति इतनी थी कि कोई भी देवता या मानव उन्हें तोड़ नहीं सकता था।

नर-नारायण और राक्षस का युद्ध

दुरदुंभ के अत्याचारों से त्रस्त देवता जब भगवान विष्णु के पास पहुँचे, तो उन्होंने उन्हें नर-नारायण ऋषि के पास भेजा। नर-नारायण ने देवताओं को वचन दिया कि वे उस राक्षस का अंत करेंगे। युद्ध प्रारंभ हुआ। पहले नर ने युद्ध किया, और हर बार जब उन्होंने एक कवच तोड़ा, स्वयं की भी मृत्यु हो गई। फिर नारायण ने उन्हें अपने तप के बल से जीवित किया और स्वयं युद्ध में उतरे। यह सिलसिला चलता रहा  एक-एक करके राक्षस के 99 कवच टूट गए, और जब अंतिम कवच बचा, तो राक्षस भागकर सूर्यदेव के शरण में चला गया।

PunjabKesari

सूर्यदेव से जुड़ा श्राप और द्वापर युग का जन्म

नारायण ने सूर्यदेव से कहा कि चूंकि आपने राक्षस की रक्षा की है, इसलिए इसका परिणाम आपको भी भोगना होगा। इस श्राप के फलस्वरूप, द्वापर युग में यही राक्षस सूर्यदेव के तेज से जन्म लेगा  यानी कर्ण, जो कवच-कुंडल के साथ जन्मेगा, लेकिन अंत में वे उसके किसी काम नहीं आएंगे।

कर्ण की दानवीरता और इंद्र द्वारा छल

कर्ण की सबसे बड़ी पहचान उनकी दानवीरता थी। वे रोज़ गंगा स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देकर दान करते थे। महाभारत युद्ध से पहले देवता इंद्र, जो अर्जुन के पिता थे, एक ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास पहुँचे और उनसे कवच-कुंडल दान में मांग लिए। कर्ण जानते थे कि दान देने से उनकी मृत्यु निश्चित हो जाएगी, फिर भी उन्होंने अपने वचन और धर्म का पालन किया। इसीलिए उन्हें दानवीर कर्ण कहा गया।

कर्ण की मृत्यु और अर्जुन से संबंध

कवच-कुंडल के बिना कर्ण युद्ध में कमजोर पड़ गए। महाभारत युद्ध में उन्होंने वीरता से अर्जुन का सामना किया, लेकिन नियति ने अपना काम किया। कृष्ण की नीति और अर्जुन के बाणों के आगे कर्ण का वध हो गया। कहा जाता है, अगर कवच-कुंडल दान न दिए होते, तो अर्जुन का भी वध निश्चित था।

कर्ण – चरित्र का सबसे उजला पक्ष

कर्ण का जीवन त्रासदी और सम्मान का मिश्रण था। उन्होंने कभी अपने कर्म से पीछे नहीं हटे। दुर्योधन के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें नायक से खलनायक बना दिया, लेकिन उनकी दानवीरता, निष्ठा और आत्मसम्मान आज भी प्रेरणा हैं। महाभारत में हुए तमाम छल के बावजूद, कर्ण का नाम आज भी ‘सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण’ के रूप में अमर है।
 

 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Priya Yadav

Related News

static