Harish Rana को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति, फैसले में पढ़ा संस्कृत श्लोक
punjabkesari.in Saturday, Mar 14, 2026 - 01:00 PM (IST)
नारी डेस्क : जिंदगी और मौत का फैसला आमतौर पर इंसान के हाथ में नहीं होता। हर व्यक्ति को उतनी ही जिंदगी जीनी पड़ती है जितनी किस्मत में लिखी होती है। हालांकि कई बार लोग निराशा में आकर अपनी जिंदगी खुद खत्म कर लेते हैं, लेकिन इच्छामृत्यु जैसे मामलों में कानून और अदालत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी बीच भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक ऐतिहासिक मामला सामने आया है। Supreme Court of India ने गाजियाबाद के रहने वाले 32 वर्षीय हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। इस मामले में फैसला सुनाते समय Supreme Court of India के जज भावुक भी नजर आए। निर्णय लिखते हुए उन्होंने इंग्लैंड के साहित्य से लेकर भारत के प्राचीन ग्रंथों तक का उल्लेख किया।
फैसले की शुरुआत में उद्धृत की गई विचारधारा
अदालत ने अपने फैसले की शुरुआत 19वीं सदी के अमेरिकी समाज सुधारक Henry Ward Beecher के विचार से की। कोर्ट ने लिखा कि जीवन हमें चुनने का विकल्प नहीं देता, लेकिन हम उसे किस तरह स्वीकार करते हैं, यह हमारा चुनाव होता है। इसके साथ ही न्यायाधीशों ने 16वीं सदी के प्रसिद्ध साहित्यकार William Shakespeare के प्रसिद्ध विचार “To be or not to be” का भी उल्लेख किया और कहा कि यह जीवन और मृत्यु के बीच मनुष्य की गहरी दुविधा को दर्शाता है।

अनुच्छेद 21 में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार
Supreme Court of India की पीठ जस्टिस K. V. Viswanathan और जस्टिस J. B. Pardiwala ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है। इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने यह भी माना कि कुछ परिस्थितियों में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी इसी दायरे में आता है।
माता-पिता की पीड़ा का भी जिक्र
अदालत ने अपने फैसले में Harish Rana के माता-पिता और परिवार की पीड़ा का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि पिछले 12–13 वर्षों में परिवार ने पूरी निष्ठा से उनकी देखभाल की और इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब स्थिति में सुधार की कोई उम्मीद नहीं बची, तब उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया।
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फैसले में उद्धृत किया गया संस्कृत श्लोक
फैसले में अदालत ने एक प्राचीन ग्रंथ का संस्कृत श्लोक भी उद्धृत किया
“चिंता चिता द्वयोर्मध्ये,
चिंता तत्र गरीयसी।
चिता दहति निर्जीवं,
चिंता दहति सजीवकम्।”
अर्थात: चिता और चिंता में चिंता अधिक भयानक है, क्योंकि चिता केवल मृत शरीर को जलाती है, जबकि चिंता जीवित व्यक्ति को भी जला देती है।

अदालत ने क्या कहा: कोर्ट ने कहा कि इस आदेश से परिवार का दुख पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, लेकिन लंबे समय से चली आ रही पीड़ा और मानसिक तनाव कुछ हद तक कम हो सकेगा।
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कैसे हुई थी दुर्घटना
Harish Rana मूल रूप से गाजियाबाद के रहने वाले हैं और 2013 में पंजाब में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 20 अगस्त 2013 को जिस पेइंग गेस्ट बिल्डिंग में वे रहते थे, वहां की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर चोटें आईं और तभी से वह कोमा में हैं। अब अदालत के आदेश के बाद उन्हें अस्पताल में शिफ्ट किया जाएगा, जहां इच्छामृत्यु की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके लिए All India Institute of Medical Sciences ने एक मेडिकल कमेटी भी गठित की है।

