''पापा मेरी लाश को हाथ न लगाएं'', पिता से इतनी नफरत? Parents के लिए सबक
punjabkesari.in Saturday, Apr 25, 2026 - 01:41 PM (IST)
नारी डेस्क: उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक दिल को चीर देने वाला मामला सामने आया है। यहां पर एक 24 साल के लड़के जिसका नाम प्रियांशु था। उसने कानपुर कोर्ट बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी। जब ये घटना हुई तो लोगों को लगा कि शायद उस पर काम के दबाव होगा, इसकी वजह से उसने अपनी जीवनलीला खत्म कर ली। लेकिन, जब पुलिस ने इस मामले की जांच की तो एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला। सुसाइड नोट में जो बातें लिखी थी, उसे पढ़कर पुलिस भी सन्न हो गई।
सुसाइड नोट में क्या लिखा?
इस सुसाइड नोट में जो बातें लिखी गई वो आपके दिल को चीर कर रख देगी। इसमें प्रियांशु ने अपने पिता पर कई गंभीर आरोप लगाएं है। उसने लिखा, ''बचपन में फ्रिज से आम का जूस पीने पर पिता ने उन्हें नंगा करके घर से निकाल दिया था। हाईस्कूल में कम नंबर आने पर भी उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करने की धमकी दी गई थी। प्रियांशु के मुताबिक, पिता हर समय उन पर नजर रखते थे, जिससे उन्हें मोहल्ले में बेइज्जती महसूस होती थी। नोट में लिखा गया कि 'भगवान मेरे जैसे पिता किसी को न दे', और अंत में यह इच्छा जताई कि उसके पिता उसके शव को हाथ न लगाएं...।
नोट में अपनी पहचान न होने का दर्द बयां किया।वो अपने पिता के साथ उनके चैंबर में काम करता था। नोट में लिखा कि न कोई अपना चैंबर है और न ही कोई ऑफिस, वे दिन भर पिता के लिए ही काम करते रहते हैं। मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरी कोई अहमियत नहीं है। प्रियांशु के अनुसार, वे किसी गलत संगत में नहीं थे, फिर भी पिता की बेवजह की सख्ती ने उन्हें मौत के रास्ते पर ढकेल दिया।
बच्चों की ऐसी परवरिश खतरनाक
ये सुसाइड सालों से चली आ रही उस ‘टॉक्सिक पेरेंटिंग’ का नतीजा थी जो अनुशासन के नाम पर मासूम बचपन का कत्ल कर देती है। बच्चों के माता-पिता को बच्चे को समझना चाहिए। उनके मन की बातों को समझना चाहिए, उनसे पूछना चाहिए कि वो कैसा महसूस करते है। बच्चों को उनकी गलतियों पर समझाएं, लेकिन उनके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाए। मनोवैज्ञानिक यह कहते हैं कि जब माता-पिता बच्चे के आत्मसम्मान को लगातार चोट पहुंचाते हैं, तो बच्चा ‘सेल्फ-लोथिंग’ (खुद से नफरत) का शिकार हो जाता है।
प्रियांशु का सुसाइड नोट में ये लिखना कि उसके पिता उसके शव को हाथ भी न लगाएं ये दर्शाता है कि उसका मानसिक जुड़ाव अपने पिता से पूरी तरह टूट चुका था और वह मौत के बाद भी उस अपमान से मुक्ति चाहता था। माता-पिता को चाहिए कि वो बच्चों को अनुशासन का अर्थ सिखाए, न कि उन्हें डराए। बच्चे को भीड़ में या पड़ोसियों के सामने डांटना उसे सुधारता नहीं, बल्कि उसके भीतर विद्रोह या गहरा अवसाद पैदा करता है। सार्वजनिक अपमान (Public Shaming) बच्चे के आत्मसम्मान को हमेशा के लिए मार देता है। इसलिए माता-पिता को बच्चे को किसी के सामने नहीं डांटना चाहिए और उसे प्यार से समझाना चाहिए।

