ECG के दौरान महिलाओं को कपड़े नहीं उतारने पड़ेंगे, केरल की छात्रा ने बनाया खास गाउन
punjabkesari.in Wednesday, Aug 27, 2025 - 03:32 PM (IST)

नारी डेस्क: केरल के कोच्चि की रहने वाली मालविका बायजू, जो कि राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) अहमदाबाद में पढ़ाई कर रही हैं, ने महिलाओं के लिए एक ऐसा स्पेशल गाउन बनाया है जिससे ईसीजी (ECG) जांच के दौरान महिलाओं को अपने कपड़े उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा, उन्होंने एक बायोडिग्रेडेबल ईसीजी इलेक्ट्रोड भी विकसित किया है जो प्लास्टिक इलेक्ट्रोड की जगह इस्तेमाल हो सकता है।
समस्या क्या थी?
ईसीजी टेस्ट के दौरान मरीज की छाती पर इलेक्ट्रोड्स लगाए जाते हैं, जिसके लिए अक्सर महिलाओं को अपने कपड़े उतारने पड़ते हैं। यह कई महिलाओं के लिए असहजता का कारण बनता है। मालविका ने एक बार ऐसी महिला को देखा जो इस वजह से बहुत शर्मिंदा हो रही थी, तब उन्होंने इस समस्या का समाधान खोजने का मन बनाया।
कैसे हुआ समाधान?
मालविका ने करीब डेढ़ साल तक मेडिकल टेक्नीशियनों और ईसीजी विशेषज्ञों के साथ काम करके इस प्रक्रिया की बारीकियां समझीं। फिर उन्हें अपने घर में एक सामान्य लेकिन खास चीज मिली टैपिओका स्टार्च, जो केरल का मुख्य खाद्य पदार्थ है। आमतौर पर टैपिओका स्टार्च को फेंक दिया जाता है, लेकिन मालविका ने इसे इस्तेमाल किया और टैपिओका से बायोडिग्रेडेबल बायोपॉलिमर फिल्म बनाई।
बायोडिग्रेडेबल इलेक्ट्रोड
आम तौर पर ईसीजी इलेक्ट्रोड प्लास्टिक से बने होते हैं, जो लगभग 35 से 45 साल तक नष्ट नहीं होते और मेडिकल कचरे की समस्या बढ़ाते हैं। मालविका के बनाए हुए टैपिओका आधारित इलेक्ट्रोड मात्र 40 से 55 दिन में पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, जिससे पर्यावरण को बहुत कम नुकसान होता है।
स्पेशल गाउन
मालविका ने एक ऐसा गाउन डिजाइन किया है जिसमें खास जेबें और थैले बने हैं। इस गाउन की मदद से ईसीजी इलेक्ट्रोड्स सीधे कपड़ों के ऊपर लगाए जा सकते हैं, जिससे महिलाओं को कपड़े उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह डिजाइन भारतीय पेटेंट कार्यालय से पंजीकृत भी हो चुका है।
मालविका की आगे की योजना
मालविका बताती हैं कि भारत में उनके शोध के लिए संसाधन सीमित हैं, इसलिए वह विदेश में पीएचडी करना चाहती हैं ताकि अपने डिज़ाइनों को और बेहतर बनाया जा सके। भविष्य में वह इसे व्यावसायिक रूप से बाज़ार में भी लाना चाहती हैं।
मालविका की प्रेरणा
मालविका पहले फैशन डिजाइनर बनना चाहती थीं, लेकिन उनके माता-पिता को यह मंजूर नहीं था। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की और फिर NID अहमदाबाद में दाखिला लिया। अब वह न सिर्फ महिलाओं की समस्या का समाधान कर रही हैं बल्कि पर्यावरण के लिए भी काम कर रही हैं।