मासिक धर्म, परंपरा और बदलती संवेदनाएं
punjabkesari.in Monday, Oct 19, 2026 - 06:21 PM (IST)
नारी डेस्क : मासिक धर्म यानी पीरियड्स हर महिला के जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं। सदियों से चली आ रही इस शारीरिक प्रक्रिया को लेकर समाज में कई तरह की मान्यताएं और परंपराएं रही हैं। इनमें से एक परंपरा ऐसी भी है, जिसके तहत पीरियड्स के दौरान महिलाओं को पांच-छह दिनों तक अलग रहने, अलग बर्तनों में खाना खाने और पूजा-पाठ से दूर रहने के लिए कहा जाता था। वक्त बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन इन परंपराओं से जुड़े कई सवाल आज भी कायम हैं। कुछ क्षण बाद समझ आया कि वह वर्तमान नहीं, बचपन की कोई पुरानी स्मृति थी जो भीतर जाग उठी थी। मुझे अपनी दादी याद आईं। वे दिन याद आए जब मासिक धर्म के समय अलग बर्तन रखे जाते थे, बैठने की जगह अलग होती थी, कुछ वस्तुओं को छूने से मना किया जाता था और पूजा या घर के कुछ हिस्सों से दूरी रखने को कहा जाता था। उस समय न हमने बहुत प्रश्न किए, न शायद हमारे बड़ों ने इन नियमों को कठोरता के रूप में देखा। वे स्वयं भी एक परंपरा के भीतर पले-बढ़े थे और वही आगे बढ़ाते रहे जो उन्होंने अपने परिवारों और समाज से सीखा था। यही कारण है कि आज मासिक धर्म पर बात करते समय हमें संवेदनशीलता की आवश्यकता है। केवल महिलाओं के प्रति नहीं, बल्कि उन पीढ़ियों के प्रति भी जिन्होंने अपने समय की सामाजिक और धार्मिक समझ के अनुसार जीवन जिया।

हमारी संस्कृति में स्त्री के सम्मान को अत्यंत ऊंचा स्थान दिया गया है। मनुस्मृति का प्रसिद्ध वाक्य है—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”
अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहां देवत्व का वास माना जाता है।
यदि हमारी परंपरा स्त्री को इतनी गरिमा देती है, तो उसके शरीर की स्वाभाविक प्रक्रियाओं को भी उसी संवेदना और सम्मान से समझना चाहिए। मासिक धर्म प्रकृति की अत्यंत सामान्य और आवश्यक जैविक प्रक्रिया है। दुनिया में करोड़ों महिलाएँ और किशोरियां हर महीने इससे गुजरती हैं। आज स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में मासिक धर्म को केवल स्वच्छता का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सम्मान, शिक्षा और महिलाओं की सहज सामाजिक भागीदारी से भी जोड़ा जा रहा है। भारतीय परंपरा स्वयं बहुत विविध है। कहीं मासिक धर्म के दिनों में विश्राम की परंपरा रही, कहीं पूजा-पाठ से दूरी रखी गई, तो कहीं स्त्री की प्रजनन शक्ति को प्रकृति और सृजन से जोड़कर देखा गया। असम का कामाख्या मंदिर इसका प्रसिद्ध उदाहरण है, जहां अम्बुबाची पर्व देवी की सृजनात्मक शक्ति से जुड़ा हुआ है।
उपनिषदों का यह विचार भी हमारे लिए मार्गदर्शक हो सकता है
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
अर्थात यह सम्पूर्ण जगत एक ही परम सत्ता से आवृत है। यदि जीवन और प्रकृति उसी व्यापक सत्य का हिस्सा हैं, तो शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाएं भी किसी हीनता का कारण नहीं हो सकतीं। बचपन में घर का एक छोटा-सा गिलास, कटोरी, थाली या बैठने का स्थान भी कभी-कभी मन में बहुत गहरी स्मृति बना देता है। वस्तु अपने आप में केवल वस्तु होती है, लेकिन उससे जुड़ा व्यवहार उसे अर्थ दे देता है। यही अर्थ आगे चलकर हमारी भावनाओं का हिस्सा बन जाता है। कई बार किसी महिला को वर्षों बाद भी कोई पुराना बर्तन, कोई अलग चादर या कोई विशेष स्थान देखकर अपने बचपन की वही अनुभूति याद आ सकती है। यह स्मृति विद्रोह की नहीं होती; कई बार यह केवल उस बच्ची की स्मृति होती है जो उस समय यह नहीं समझ पाती थी कि उसके लिए कुछ नियम अचानक क्यों बदल गए हैं।

यहीं समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है
बदलाव का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी दादी-नानी की पीढ़ी को गलत ठहरा दें। शायद बेहतर रास्ता यह है कि हम उनसे प्रेम भी रखें और कुछ परंपराओं को नई समझ के साथ देखें।भारतीय चिंतन हमें बार-बार संतुलन की ओर ले जाता है। भगवद्गीता कहती है—“समत्वं योग उच्यते।” अर्थात संतुलन ही योग है। शायद यही संतुलन हमें परंपरा और आधुनिक समझ के बीच भी चाहिए। न अंध-अस्वीकार, न अंध-स्वीकार—बल्कि विवेकपूर्ण संवेदना।
यदि मासिक धर्म के दौरान किसी महिला को विश्राम चाहिए, तो उसे विश्राम मिलना चाहिए पर इसे अशुद्धता का नाम देना आवश्यक नहीं। यदि स्वच्छता के लिए कुछ नियम बनाए जाएं, तो उन्हें स्वास्थ्य और सुविधा से जोड़ा जा सकता है। यदि कोई महिला अपनी श्रद्धा के अनुसार कुछ धार्मिक मर्यादाएं मानना चाहती है, तो वह उसका व्यक्तिगत चुनाव हो सकता है; लेकिन उसके भीतर यह भावना नहीं आनी चाहिए कि उसकी प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया ने उसे किसी प्रकार कम पवित्र या कम सम्माननीय बना दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण है हमारी बेटियों के मन में बनने वाली पहली भाषा
यदि पहली बार मासिक धर्म आने पर एक बेटी यह सुनती है, अब तुम अशुद्ध हो तो उसके मन में अपने ही शरीर को लेकर संकोच जन्म ले सकता है। लेकिन यदि उसी क्षण उससे कहा जाए, यह जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है, अपना ध्यान रखो, आराम करो तो वही अनुभव आत्मविश्वास का आधार बन सकता है। समाज का परिवर्तन अक्सर बड़े भाषणों से नहीं, घरों के छोटे-छोटे व्यवहारों से शुरू होता है।

हमारी प्रार्थना परंपरा का एक सुंदर भाव है
“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।” जब हम सबके सुख और निरामय जीवन की कामना करते हैं, तो उसमें स्त्री का शारीरिक और मानसिक सम्मान भी स्वाभाविक रूप से शामिल होना चाहिए। शायद आज हमें केवल इतना करना है कि अपनी बेटियों को वह सहजता दें जो हमारी पिछली पीढ़ियों को हमेशा नहीं मिल सकी। और अपनी दादी-नानी को उस कठोरता से न आंकें, जिसके लिए वे स्वयं भी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं थीं।हम अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए प्रश्न पूछ सकते हैं।
हम आध्यात्मिक होते हुए वैज्ञानिक सोच रख सकते हैं।
हम स्वच्छता को महत्व देते हुए किसी स्त्री को अशुद्ध कहने से बच सकते हैं।
और हम बदलते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़े रह सकते हैं।
क्योंकि अंततः मासिक धर्म किसी स्त्री की सीमित पहचान नहीं, बल्कि उस प्रकृति का हिस्सा है जिसने मनुष्य जीवन को आगे बढ़ाया है। शायद स्त्रीत्व की वास्तविक स्वतंत्रता वहीं से शुरू होती है,जहां, एकस्त्री अपने शरीर को संकोच से नहीं, सहजता, गरिमा और सम्मान से देख सके।
लेखिका - तनु जैन, छावनी परिषद बरेली हैं

