सिर्फ पिता ही देगा बच्चे को अपना Surname ऐसा नहीं है कोई Rule, दीपिका पादुकोण ने दे दी ये बड़ी सीख
punjabkesari.in Friday, Oct 23, 2026 - 04:43 PM (IST)
नारी डेस्क: दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने हाल ही में अपनी छोटी बेटी के नाम की घोषणा की- देवी पादुकोण सिंह। उनकी दोनों बेटियों के नाम में माता (पादुकोण) और पिता (सिंह) दोनों का सरनेम शामिल किया गया है, जिसके बाद से ही लोगों की प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। कुछ लोगों ने तो यह भी राय दे दी कि सिंह की काफी थी पादुकोण लगाने की क्या जरूरत थी। क्योंकि हमारे समाज में बच्चे के नाम के साथ पिता का सरनेम जुड़ना इतना स्वाभाविक मान लिया गया है कि मां का सरनेम शामिल करना एक अलग चुनाव बन जाता है।

मां के सरनेम से नहीं खोती पिता की पहचान
दीपिका की बेटियों के नाम में मां की पहचान शामिल होने से पिता की पहचान गायब नहीं हुई है। जब किसी बेटी के नाम में उसकी मां की पहचान भी मौजूद हो, तो यह उसे परिवार के दोनों पक्षों से जुड़ाव का एहसास दे सकता है। दीपिका से बहुत पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने एक ऐसा फैसला लिया था, जो अपने समय की सामाजिक सोच से काफी अलग था। उन्होंने बिना शादी के मां बनने और अपनी बेटी की परवरिश करने का फैसला किया। उनकी बेटी मसाबा को पिता विवियन रिचर्ड्स के बजाय मां का सरनेम मिला। दुनिया उन्हें मसाबा गुप्ता के नाम से जानती है।
सामाजिक परंपरा बन गया है पिता का सरनेम
ज़्यादातर भारतीय परिवारों में बच्चे को पिता का उपनाम (surname) मिलना एक नियम जैसा लगता है लेकिन नामकरण और लिंग (gender) से जुड़े शोधों की समीक्षा से पता चलता है कि मां के बजाय पिता का उपनाम चुनना एक सामाजिक परंपरा है, न कि कोई जैविक ज़रूरत और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी इस पर ध्यान दिलाया है। इसी समीक्षा में बताया गया है कि महिलाओं के उपनाम की जगह पुरुषों के उपनाम को प्राथमिकता देने की प्रथा को संयुक्त राष्ट्र (1979 में) और काउंसिल ऑफ़ यूरोप (2008 में) ने लैंगिक समानता (gender equality) के मुद्दे के रूप में देखा है।

मां के नाम से भी बन सकता है बच्चे का पासपोर्ट
यहां एक ऐसी बात है जो ज़्यादातर माता-पिता को हैरान कर देती है: भारत में पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया में दोनों माता-पिता के नाम देना जरूरी नहीं है। विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट नियमों से जुड़ी प्रेस रिलीज़ के अनुसार, ऑनलाइन पासपोर्ट आवेदन फॉर्म में आवेदक को पिता, माता या कानूनी अभिभावक में से किसी एक का नाम देना होता है यानी दोनों में से सिर्फ़ एक का नाम देना काफ़ी है। इसका मतलब यह है कि एक माँ अपने बच्चे का पासपोर्ट सिर्फ़ अपना नाम देकर बनवा सकती है, जिसमें पिता का नाम देने की कोई ज़रूरत नहीं होती।
बच्चे के पब्लिक पहचान को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि जैविक पिता (पति) की मृत्यु के बाद, मां ही बच्चे की एकमात्र स्वाभाविक संरक्षक (natural guardian) होती है, इसलिए बच्चे का सरनेम तय करने का अधिकार उसी के पास है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था- उपनाम केवल वंश का ही सूचक नहीं होता; इसे केवल इतिहास, संस्कृति और वंश के संदर्भ में ही नहीं देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा था- "एक समाज जो डेवलप होने का दावा करता है, वह इस बात पर ज़ोर नहीं दे सकता कि बच्चे की पब्लिक पहचान उसके पिता से जुड़ी हो, जो बच्चे की ज़िंदगी से गायब हो जबकि मां जो बच्चे की परवरिश का पूरा बोझ उठाती है, एडमिनिस्ट्रेटिव तौर पर सेकेंडरी बनी रहे। राज्य के फॉर्मेट नैतिक फैसले नहीं बनने चाहिए; उन्हें भलाई का सही ज़रिया बनना चाहिए।"

