Krishna Janmashtami 2026: भगवान श्रीकृष्ण को क्यों लगाया जाता है 56 भोग? जानिए परंपरा
punjabkesari.in Monday, Aug 31, 2026 - 05:17 PM (IST)
नारी डेस्क: जन्माष्टमी आते ही भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। मंदिरों में विशेष सजावट होती है, घरों में कान्हा के लिए झूला सजाया जाता है और आधी रात को उनके जन्म का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाने की भी परंपरा है। इनमें सबसे खास माना जाता है ‘छप्पन भोग’। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण को 56 तरह के व्यंजनों का ही भोग क्यों लगाया जाता है? इसके पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने से बताया जाता है।
4 सितंबर को मनाई जाएगी जन्माष्टमी
भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में जन्माष्टमी मनाई जाती है। साल 2026 में यह पर्व 4 सितंबर को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के लिए व्रत रखते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और कई जगहों पर कृष्ण लीला का मंचन भी किया जाता है। रात में श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा के बाद उन्हें अलग-अलग तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है।

आखिर 56 भोग ही क्यों?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में कई संख्याओं को शुभ माना जाता है। 5, 7, 11, 21 और 51 जैसी संख्याओं का धार्मिक महत्व बताया जाता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि भगवान श्रीकृष्ण के लिए 56 भोग की परंपरा कैसे बनी? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी वजह श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और गोवर्धन पर्वत से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा में मिलती है।
इंद्रदेव की पूजा करते थे गोकुलवासी
पौराणिक कथा के अनुसार, गोकुल के लोग हर साल अच्छी बारिश और अच्छी फसल की कामना के लिए इंद्रदेव की पूजा किया करते थे। उनका मानना था कि इंद्रदेव की कृपा से वर्षा होती है और खेती के लिए पर्याप्त पानी मिलता है। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों से कहा कि उनकी जिंदगी और खेती के लिए गोवर्धन पर्वत का भी बहुत बड़ा योगदान है। पर्वत प्रकृति और पर्यावरण का आधार है और वहां से मिलने वाली वनस्पतियां और जलस्रोत उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। श्रीकृष्ण की बात सुनकर गोकुलवासियों ने उस वर्ष इंद्रदेव की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का फैसला किया।
गुस्से में इंद्रदेव ने बरसाई मूसलाधार बारिश
गोकुलवासियों का यह फैसला इंद्रदेव को पसंद नहीं आया। पौराणिक कथा के अनुसार, उन्होंने क्रोधित होकर गोकुल में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। लगातार बारिश से पूरा गांव संकट में आ गया और लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को बचाने के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। इसके नीचे सभी ग्रामीणों और उनके पशुओं को आश्रय मिला। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने लगातार सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए रखा।

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सात दिन बाद श्रीकृष्ण को लगाया गया 56 भोग
कथा के अनुसार, जब सात दिन बाद बारिश रुकी और इंद्रदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ, तब गोकुलवासियों ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आभार जताया। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, श्रीकृष्ण ने इन सात दिनों के दौरान भोजन नहीं किया था। वहीं, माता यशोदा उन्हें दिन में आठ प्रहर के हिसाब से भोजन कराया करती थीं। एक दिन में आठ प्रहर और सात दिनों को जोड़ने पर संख्या बनती है
7 दिन × 8 प्रहर = 56
इसी मान्यता के आधार पर श्रीकृष्ण को 56 तरह के व्यंजनों का भोग लगाए जाने की परंपरा शुरू होने की कथा कही जाती है। समय के साथ ‘छप्पन भोग’ जन्माष्टमी की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल हो गया। अलग-अलग मंदिरों और घरों में अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को तरह-तरह के पकवान अर्पित किए जाते हैं। छप्पन भोग में मीठे पकवानों से लेकर नमकीन व्यंजन, फल, माखन, मिश्री और कई तरह की पारंपरिक चीजें शामिल की जाती हैं। भोग लगाने के बाद इसे प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा जाता है।

हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में छप्पन भोग की सामग्री और उसे तैयार करने का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन इसके पीछे भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना एक जैसी रहती है।

