थाली में 3 रोटी रखना है महापाप, ब्राह्मण को भोजन कराते समय याद रखें ये जरूरी नियम
punjabkesari.in Thursday, Oct 01, 2026 - 12:34 PM (IST)
नारी डेस्क: पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इन दिनों परिवार अपने पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, पूजा और दान-पुण्य करते हैं, ब्राह्मण को सम्मानपूर्वक भोजन कराते हैं और फिर उन्हें दक्षिणा या दान देने की परंपरा होती है। ब्राह्मण भोजन का मुख्य उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा, सेवा और दान की भावना व्यक्त करना माना जाता है, लेकिन इस दौरान कुछ खास नियमों का ध्यान रखना जरूरी है।

ब्राह्मणों को भोजन खिलाने के नियम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध के दौरान ब्राह्मण को भोजन कराने से पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है। इसे श्राद्ध कर्म और दान-पुण्य से जोड़कर देखा जाता है। श्राद्ध के दौरान भोजन कराने से पहले पितरों का स्मरण किया जाता है और उनकी शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। भोजन को सम्मान के साथ परोसा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मणों को कभी भी एक साथ तीन रोटी नहीं दी जाती क्योंकि तीन रोटियों की थाली को पितरों का प्रसाद माना जाता है। थाली में 3 रोटी तब रखी जाती है जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। उस व्यक्ति के त्रयोदशी संस्कार से पहले उसके नाम की थाली लगाई जाती है, उस दौरान 3 रोटियां रखी जाती हैं। यहीं कारण हैं कि जीवित व्यक्ति की थाली में तीन रोटी नहीं रखी जाती।
तीन तिगाड़ा,काम बिगाड़ा
कई मान्यताओं के अनुसार, यह भी कहा जाता है कि थाली में तीन रोटी एक साथ रखकर खाने से व्यक्ति के मन में दूसरों के लिए शत्रुता का भाव उत्पन्न हो जाता है। इसलिए यह कहावत भी प्रचलित है कि “तीन तिगाड़ा,काम बिगाड़ा”। इसका मतलब है कि जहां तीन लोग इकट्ठे हो जाते हैं वहां काम बिगड़ना निश्चित है। भोजन कराने के बाद ब्राह्मण को दक्षिणा, वस्त्र (धोती, अंगोछा), और जरूरत का सामान देना चाहिए। श्राद्ध के दिन घर में शुद्ध वातावरण रखें। ब्राह्मण को भोजन कराते समय बर्तन और स्थान साफ-सुथरे होने चाहिए। पहले पितरों के लिए तर्पण या जलांजलि दें, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

भोजन के बाद दक्षिणा देने की परंपरा
ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा देने की परंपरा भी है। दक्षिणा के रूप में धन, वस्त्र, अन्न या उपयोगी वस्तुएं दी जा सकती हैं। दान या दक्षिणा देते समय अपनी आर्थिक क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। दिखावे के लिए अधिक खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धा और सम्मान को अधिक महत्व दिया जाता है। दान का मुख्य उद्देश्य सेवा और सहायता की भावना रखना होना चाहिए।

