दहेज मामलों में अब ‘तारीख पर तारीख’ नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने दिए 10 निर्देश, पूरी जानकारी पढ़ें

punjabkesari.in Friday, Aug 28, 2026 - 04:06 PM (IST)

नारी डेस्क : दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या जैसे मामलों में वर्षों तक चलने वाली सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई में देरी रोकने के लिए राज्यों, हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के लिए कई अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि दहेज से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी से बचना जरूरी है, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की जल्द पेशी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके बाद 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय करने का प्रयास किया जाए। आरोप तय होने के बाद गवाही की प्रक्रिया जल्द शुरू हो और जहां संभव हो, सुनवाई लगातार या प्रतिदिन की जाए।

60-90 दिन में चार्जशीट नहीं, आरोप तय करने का प्रयास

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लेकर एक बात स्पष्ट समझना जरूरी है। अदालत ने 60 से 90 दिनों में चार्जशीट दाखिल करने की समयसीमा तय नहीं की है। चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की पेशी सुनिश्चित कर 60 से 90 दिनों में आरोप तय करने का प्रयास करने को कहा गया है। आरोप तय होने के बाद गवाहों की सुनवाई में भी अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को गवाहों की तारीख, समन की तामील और गवाहों का कैलेंडर पहले से तैयार करने पर जोर दिया है।

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आरोपी का वकील बार-बार गैरहाजिर हो तो ट्रायल न रुके

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपी का वकील पर्याप्त कारण के बिना बार-बार अदालत में पेश नहीं होता है, तो सिर्फ इस वजह से सुनवाई को अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में जरूरत पड़ने पर अदालत विधिक सहायता अधिवक्ता या न्यायमित्र की नियुक्ति कर कार्यवाही आगे बढ़ा सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक पक्ष की अनुपस्थिति के कारण पूरा मुकदमा वर्षों तक लंबित न रहे।

‘तारीख पर तारीख’ से बचने पर जोर

कोर्ट ने अनावश्यक स्थगन यानी बार-बार तारीख देने से बचने का निर्देश दिया है। अगर किसी मामले में सुनवाई टालना जरूरी हो, तो उसके कारण को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए। आरोप तय होने के बाद गवाहों की सुनवाई के लिए कैलेंडर तैयार करने से ट्रायल को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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सुप्रीम कोर्ट के 10 अहम दिशा-निर्देश

सहायता व्यवस्था मजबूत की जाए: संबंधित अधिकारियों और सहायता तंत्र को सक्रिय किया जाए। वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्प डेस्क और शिकायत व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

दहेज के खिलाफ जागरूकता बढ़े: दहेज प्रथा, लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

तीन साल से पुराने मामलों की समीक्षा: तीन साल से अधिक पुराने मामलों की हर महीने या तिमाही समीक्षा की जाए, ताकि लंबे समय से लंबित मामलों की स्थिति पर लगातार नजर बनी रहे।

ट्रायल जल्द आगे बढ़े: चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की जल्द पेशी सुनिश्चित की जाए और 60-90 दिनों के भीतर आरोप तय करने का प्रयास किया जाए। आरोप तय होने के बाद गवाही जल्द शुरू की जाए।

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अनावश्यक स्थगन से बचें: बिना पर्याप्त कारण के बार-बार तारीख न दी जाए। अगर स्थगन दिया जाता है तो उसका कारण रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।

डिजिटल निगरानी व्यवस्था बने: पुराने मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड और ऑटोमैटिक अलर्ट सिस्टम जैसी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया है।

हाईकोर्ट पुराने मामलों की समीक्षा करें: हाईकोर्ट में लंबित पुरानी अपील, रिवीजन, याचिकाओं और जमानत मामलों की समीक्षा की जाए।

जिम्मेदार अधिकारियों की ट्रेनिंग: पुलिस, प्रोटेक्शन ऑफिसर और काउंसलर को दहेज मामलों से जुड़े कानून और प्रक्रिया को लेकर उचित प्रशिक्षण दिया जाए।

उचित मामलों में ही मध्यस्थता: जहां परिस्थितियां और कानून इसकी अनुमति देते हों, उन्हीं उचित मामलों में कोर्ट मध्यस्थता के विकल्प पर विचार करे।

नियमित रिपोर्टिंग हो: राज्यों और हाईकोर्ट को दिशा-निर्देशों के पालन और लंबित मामलों की स्थिति को लेकर नियमित रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। रिपोर्टिंग के लिए 15 जनवरी, मई और सितंबर की तारीखों का उल्लेख किया गया है।

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पुराने मामलों पर भी रहेगी नजर

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने लंबित मामलों को लेकर भी चिंता जताई है। तीन साल से अधिक समय से चल रहे मामलों की नियमित समीक्षा करने से यह पता लगाया जा सकेगा कि मुकदमा किस स्तर पर अटका हुआ है और उसे आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम जरूरी हैं। कोर्ट का जोर इस बात पर है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद मामला अनावश्यक औपचारिकताओं और लगातार स्थगन के कारण वर्षों तक न खिंचे। आरोप तय होने के बाद गवाहों की तारीख, समन की तामील और गवाहों का कैलेंडर तैयार होने से ट्रायल को गति देने में मदद मिलेगी।

क्यों अहम हैं ये निर्देश?

दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या के मामलों में लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया पीड़ित परिवारों के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य ऐसे मामलों की सुनवाई को ज्यादा व्यवस्थित और समयबद्ध बनाना है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि सिर्फ तारीख पर तारीख देकर मुकदमों को लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट, पुलिस और संबंधित अधिकारियों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी प्रभावी तरीके से निभानी होगी, ताकि दहेज से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न हो।


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Content Editor

Monika

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