SC ने 20 साल बाद कपल का तलाक किया मंजूर, कहा- शादी बचाने के लिए सिर्फ बातों से नहीं चलता काम
punjabkesari.in Thursday, Sep 03, 2026 - 02:19 PM (IST)
नारी डेस्क: सुप्रीम कोर्ट नेबुधवार को दो दशक से ज़्यादा पुरानी शादी को खत्म कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी का सिर्फ़ यह कहना कि वह शादी की ज़िम्मेदारियां निभाने को तैयार है, लंबे समय तक अलग रहने और साथी को छोड़ने जैसा व्यवहार करने की बात से ज़्यादा अहम नहीं हो सकता। कोर्ट ने माना कि पत्नी के बर्ताव और लंबे समय तक अलग रहने से हिंदू मैरिज एक्ट के तहत 'डेज़र्शन' (साथ छोड़कर चले जाना) साबित होता है। कोर्ट ने पति को पत्नी को स्थायी गुजारा-भत्ता (एलिमनी) के तौर पर ₹7 लाख देने का भी आदेश दिया।
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ये है पूरा मामला
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने 2 सितंबर, 2026 को सिविल अपील नंबर 10249/2014 में यह फैसला सुनाया। दोनों पक्ष 2005 से अलग-अलग रह रहे थे और उनके बीच सुलह की कोशिशें नाकाम रही थीं। बिजेन्द्र और रेखा की शादी 23 जून, 2003 को हुई थी। रिकॉर्ड के अनुसार रेखा 30 नवंबर, 2005 को अपने मायके चली गईं। जब बिजेन्द्र 15 दिसंबर, 2005 को उन्हें वापस लाने गए तो वह उनके साथ नहीं लौटीं। इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे और उनके बीच वैवाहिक संबंध फिर से शुरू नहीं हुए। इस शादी से कोई बच्चा नहीं हुआ।
2005 से अलग रह रहे थे पति-पत्नी
बिजेन्द्र ने 2007 में ट्रायल कोर्ट में तलाक के लिए अर्ज़ी दी, जिसमें उन्होंने पत्नी के घर छोड़कर चले जाने (डेज़र्शन) और मानसिक क्रूरता का आधार बताया। हालांकि ट्रायल कोर्ट को क्रूरता के आरोप पूरी तरह साबित नहीं लगे, लेकिन उसने यह माना कि रेखा 15 दिसंबर, 2005 से उन्हें छोड़कर चली गई थीं। इस बात को मानने के बावजूद, कोर्ट ने तलाक की अर्ज़ी खारिज कर दी। बाद में हाई कोर्ट ने भी तलाक न देने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ शारीरिक रूप से अलग रहने से 'डेज़र्शन' (घर छोड़कर जाना) साबित नहीं होता और बिजेन्द्र यह साबित करने में नाकाम रहे कि रेखा का इरादा हमेशा के लिए वैवाहिक जीवन खत्म करने का था (जिसे कानूनी भाषा में 'animus deserendi' कहते हैं)।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने जांच की कि क्या सबूत 'डेज़र्शन' साबित करने के लिए काफ़ी थे। कोर्ट ने माना कि दोनों पक्ष बिना किसी विवाद के 15 दिसंबर, 2005 से अलग रह रहे थे। पुराने फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने समझाया कि 'डेज़र्शन' का मतलब सिर्फ़ अलग रहना नहीं है। इसमें अलग रहने के साथ-साथ वैवाहिक जीवन को हमेशा के लिए खत्म करने का इरादा भी शामिल होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे इरादे का पता दोनों पक्षों के व्यवहार और आसपास की परिस्थितियों से लगाया जा सकता है। बेंच ने पाया कि पत्नी का यह कहना कि वह अपनी वैवाहिक ज़िम्मेदारियां निभाने को तैयार है, अकेले इस मामले का फैसला नहीं कर सकता, खासकर तब जब उसका व्यवहार कुछ और ही संकेत दे रहा हो। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि बिजेन्द्र, राम प्रकाश के साथ रेखा को वैवाहिक घर वापस लाने गए थे, लेकिन उन्होंने उनके साथ आने से इनकार कर दिया। बेंच के अनुसार, इस व्यवहार से 'डेज़र्शन' की बात साबित होती है।
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गुजारा-भत्ता जमा करवाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रेखा ने वैवाहिक रिश्ता छोड़ दिया था और बिजेन्द्र ने 'डेज़र्शन' का आधार साबित कर दिया था। हालांकि, कोर्ट ने क्रूरता के मामले में निचली अदालतों के निष्कर्षों में कोई बदलाव नहीं किया। इसलिए, 23 जून, 2003 को हुई शादी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ib) के तहत तलाक के आदेश से खत्म कर दिया गया। कोर्ट ने बिजेंद्र को निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में स्थायी गुजारा-भत्ता (permanent alimony) के तौर पर ₹7 लाख जमा करे। अगर उस समय-सीमा के भीतर यह रकम जमा नहीं की गई, तो उस पर 9% सालाना ब्याज लगेगा।

