क्या सोशल मीडिया कैंसर मरीज की ले सकता है जान? डॉक्टरों ने दी चेतावनी
punjabkesari.in Tuesday, Aug 04, 2026 - 07:09 PM (IST)
नारी डेस्क: कुछ क्लिक एक छोटा सा वीडियो और एक सनसनीखेज हेडलाइन अक्सर लोगों को ऑनलाइन कुछ भी विश्वास दिलाने के लिए काफी होती है। यह बात खासकर तब सच होती है जब मामला कैंसर का हो। जिस व्यक्ति को अभी-अभी कैंसर होने का पता चला है, उसके लिए इंटरनेट राहत और उलझन दोनों का स्रोत बन सकता है। उम्मीद की तलाश में मरीज और उनके परिवार अक्सर ऐसी ऑनलाइन जानकारी के जाल में फंस जाते हैं, जिसमें चमत्कारिक इलाज, गुप्त नुस्खे और "प्राकृतिक तरीके से ठीक होने" के दावे किए जाते हैं।
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गलत जानकारी डर करती है पैदा
डॉक्टरों की मानें तो- कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसे सोशल मीडिया रील्स या अनजान लोगों की पोस्ट से समझा जा सके। हेल्थ से जुड़ी गलत जानकारी पर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) के पेज के अनुसार, सबूतों पर आधारित मेडिकल सलाह की तुलना में गलत हेल्थ जानकारी ऑनलाइन ज़्यादा तेजी से और दूर-दूर तक फैलती है। जानकारों का कहना है कि गलत जानकारी इलाज से जुड़े फैसलों पर असर डाल सकती है, बेवजह डर पैदा कर सकती है और लोगों को समय पर इलाज कराने से रोक सकती है। कैंसर के जानकारों का कहना है कि समस्या अब सिर्फ़ बीमारी ही नहीं है, बल्कि इसके आस-पास मौजूद खतरनाक जानकारी का इकोसिस्टम भी है।
'चमत्कारी इलाज' के दावों का खतरनाक रूप
ऑनलाइन कैंसर के बारे में सर्च करने पर अनगिनत वीडियो मिलते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि कुछ खास तरह के खाने-पीने की चीज़ों, जड़ी-बूटियों या घरेलू नुस्खों से इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है। कुछ पोस्ट में तो अस्पतालों से पूरी तरह दूर रहने की सलाह भी दी जाती है। डज्ञॅक्टर कहते हैं- समस्या यह नहीं है कि हेल्दी खाना या सपोर्टिव थेरेपी बेकार हैं। इलाज के दौरान पौष्टिक डाइट और इमोशनल वेल-बीइंग (मानसिक और भावनात्मक सेहत) निश्चित रूप से मायने रखते हैं। खतरा तब शुरू होता है जब इन तरीकों को वैज्ञानिक रूप से साबित थेरेपी के विकल्प के तौर पर प्रचारित किया जाता है। अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि कोई खास जूस, जड़ी-बूटी, मसाला या डाइट अकेले कैंसर को ठीक कर सकती है।
सोशल मीडिया पर चल रही हैं निजी कहानियां
ऑनलाइन एक और आम गलतफहमी यह है कि कीमोथेरेपी, रेडिएशन या सर्जरी सिर्फ़ मरीजों को तकलीफ देने के लिए होती हैं।यह बात न सिर्फ गुमराह करने वाली है, बल्कि जानलेवा भी हो सकती है। कैंसर के इलाज में देरी के बारे में नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (NCI) के अनुसार, इलाज में देरी से कई तरह के कैंसर के नतीजों पर काफ़ी असर पड़ सकता है। कैंसर के इलाज के साइड इफ़ेक्ट हो सकते हैं। लेकिन पिछले दशक में मॉडर्न ऑन्कोलॉजी में बहुत बदलाव आया है। पुराने इलाज के तरीकों की तुलना में अब इलाज ज़्यादा टारगेटेड, ज़्यादा पर्सनलाइज़्ड और अक्सर कम टॉक्सिक (हानिकारक) हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोगों की निजी कहानियां बहुत चलती हैं। कोई कहता है कि उसने एक खास हर्बल चाय पीकर कैंसर को हरा दिया। कोई और दावा करता है कि उसने कीमोथेरेपी नहीं करवाई और फिर भी बच गया।
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इंटरनेट पर आंख बंद करके ना करें भरोसा
गलत जानकारी सिर्फ़ लोगों को उलझन में ही नहीं डालती। यह ज़िंदगी बदलने वाले फैसलों को भी बदल सकती है। कुछ मरीज बिना साबित हुए इलाज आज़माने के चक्कर में अपना इलाज टाल देते हैं। दूसरे डॉक्टर पर शक करने लगते हैं या बताई गई दवाएं लेना बंद कर देते हैं। परिवार वाले चमत्कारिक इलाज की तलाश में अपना कीमती समय और पैसा बर्बाद कर सकते हैं। इंटरनेट दुश्मन नहीं है। ज़रूरी बात यह है कि यह पता लगाया जाए कि किस पर भरोसा किया जाए। सोशल मीडिया पोस्ट, वायरल वीडियो या इंटरनेट पर बिना पुष्टि किए गए दावों के आधार पर इलाज का फ़ैसला न लें।

