15 साल तक बिना खिड़की वाले कमरे में कैद रहीं,दर्द को बनाया कला और रच दिया इतिहास

punjabkesari.in Monday, Jul 13, 2026 - 05:34 PM (IST)

नारी डेस्क:  कई बार जिंदगी इंसान को ऐसी परिस्थितियों में ला खड़ा करती है, जहां उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं देती। लेकिन कुछ लोग उन्हीं मुश्किलों को अपनी ताकत बना लेते हैं। छत्तीसगढ़ की लोक कलाकार सोनाबाई राजवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने 15 साल तक एक बंद, अंधेरे और बिना खिड़की वाले कमरे में रहने की मजबूरी को अपनी रचनात्मकता में बदल दिया और ऐसी कला को जन्म दिया, जिसने उन्हें देश-दुनिया में पहचान दिलाई।

कम उम्र में शादी और संघर्षों से भरी शुरुआत

सोनाबाई राजवार का जन्म लगभग वर्ष 1930 में छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव में हुआ था। उस दौर की सामाजिक परंपराओं के अनुसार उनकी शादी महज 14 साल की उम्र में कर दी गई। शादी के बाद करीब दस वर्षों तक उन्हें संतान नहीं हुई। आखिरकार जब उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया, तो उनकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी।

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पति ने 15 साल तक रखा कैद

बताया जाता है कि बेटे के जन्म के बाद उनके पति ने उन्हें घर के एक ऐसे कमरे में बंद कर दिया, जिसमें कोई खिड़की नहीं थी। न बाहर की दुनिया से कोई संपर्क था, न किसी से मिलने-जुलने की आजादी। लगभग 15 वर्षों तक उन्होंने इसी अंधेरे कमरे में अपना जीवन बिताया। उनके साथ सिर्फ उनका छोटा बेटा था। न बच्चे के खेलने के लिए खिलौने थे और न ही सोनाबाई के पास समय बिताने का कोई साधन। गर्मियों में कमरे का तापमान 52 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।

मिट्टी से बनाए बेटे के लिए खिलौने

अपने बेटे का मन बहलाने के लिए सोनाबाई ने घर के कुएं से मिट्टी निकालनी शुरू की। उसी मिट्टी से उन्होंने छोटे-छोटे खिलौने, जानवर, पक्षी और विभिन्न आकृतियां बनाईं। धीरे-धीरे यही काम उनका सहारा बन गया। उन्होंने लकड़ियों का इस्तेमाल ढांचा तैयार करने के लिए किया, जबकि प्राकृतिक रंग बनाने के लिए मसालों और अन्य घरेलू चीजों का उपयोग किया। कमरे में थोड़ी रोशनी आने के लिए उन्होंने मिट्टी और बांस की मदद से जालीदार संरचनाएं भी तैयार कीं।

बिना किसी प्रशिक्षण के रची नई कला

सोनाबाई ने कभी किसी कला विद्यालय में पढ़ाई नहीं की और न ही किसी गुरु से प्रशिक्षण लिया। उन्होंने जो कुछ सीखा, वह अपने अनुभव और कल्पनाशक्ति से सीखा। धीरे-धीरे उन्होंने मिट्टी से उभरी हुई आकृतियां बनाने की एक अनोखी शैली विकसित की, जिसे भारतीय लोक कला में एक अलग पहचान मिली।उनके घर की दीवारें, कोने और हर खाली जगह उनकी कला से भरने लगीं। उनका पूरा घर एक जीवंत कला दीर्घा में बदल गया।

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15 साल बाद मिली आजादी

करीब 1968 में उनके पति ने उन्हें कमरे से बाहर निकलने की अनुमति दी। इतने वर्षों तक दुनिया से दूर रहने के बाद भी सोनाबाई ने अपनी कला को नहीं छोड़ा। वह लगातार अपनी रचनाओं को नया रूप देती रहीं।

1983 में दुनिया ने पहचानी उनकी प्रतिभा

सोनाबाई की कला लंबे समय तक घर की चारदीवारी तक ही सीमित रही। लेकिन 1983 में कला जगत की नजर उनकी अद्भुत रचनाओं पर पड़ी। उनकी अनोखी मिट्टी की कलाकृतियों ने कला प्रेमियों और विशेषज्ञों को हैरान कर दिया। इसके बाद उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके संघर्ष, धैर्य और अद्भुत रचनात्मकता का प्रतीक बन गया।

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आज भी प्रेरणा देती है उनकी विरासत

सोनाबाई राजवार का निधन 2007 में हुआ, लेकिन उनकी बनाई कला आज भी लोगों को प्रेरित करती है। उनका घर अब एक जीवंत संग्रहालय (लिविंग म्यूजियम) के रूप में जाना जाता है, जहां उनकी बनाई गई अनमोल कलाकृतियां सुरक्षित रखी गई हैं। सोनाबाई राजवार की कहानी सिर्फ एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी इंसान अपनी रचनात्मकता और हिम्मत के दम पर नई राह बना सकता है। अंधेरे कमरे में बिताए गए 15 साल उनके लिए कैद जरूर थे, लेकिन उसी कैद ने एक ऐसी कला को जन्म दिया, जिसने उन्हें भारतीय लोक कला के इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया।
 

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Content Editor

Priya Yadav

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