Heart Attack से पहले मिल सकता है खतरे का संकेत! ये डिवाइस बताएगा आपकी धमनियों की उम्र

punjabkesari.in Thursday, Aug 27, 2026 - 02:59 PM (IST)

नारी डेस्क : उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं। इसका असर हमारी धमनियों पर भी पड़ता है। कई बार किसी व्यक्ति की वास्तविक उम्र और उसकी धमनियों की उम्र में काफी अंतर हो सकता है। अगर धमनियां उम्र से पहले ही कठोर होने लगें, तो यह आगे चलकर हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों के खतरे का संकेत हो सकता है। इसी दिशा में आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से कुछ ही मिनटों में धमनियों की सेहत और उनकी कठोरता का आकलन किया जा सकता है। इस तकनीक का नाम आर्टसेंस है। खास बात यह है कि इसके लिए शरीर में किसी तरह की सुई लगाने, खून निकालने या चीरा लगाने की जरूरत नहीं होती।

क्या है आर्टसेंस तकनीक?

आर्टसेंस का पूरा नाम धमनियों की कठोरता का गैर-आक्रामक मूल्यांकन है। इसे इस तरह विकसित किया गया है कि व्यक्ति की धमनियों की स्थिति का पता बिना किसी शल्य प्रक्रिया के लगाया जा सके। इस जांच के दौरान गर्दन के पास मौजूद कैरोटिड धमनी की स्थिति मापी जाती है। इसके साथ हाथ और जांघ पर हल्के दबाव वाले पट्टे लगाए जा सकते हैं। इन मापों से धमनियों की कठोरता और रक्त के प्रवाह से जुड़े महत्वपूर्ण संकेतकों का आकलन किया जाता है।आईआईटीमद्रास (IIT Madras) के अनुसार, इस तकनीक की मदद से कैरोटिड धमनी की कठोरता, महाधमनी में नाड़ी तरंग की गति और केंद्रीय रक्तचाप जैसे महत्वपूर्ण संकेतकों को मापा जा सकता है।

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धमनियों की उम्र का पता लगाना क्यों जरूरी?

हमारे शरीर में धमनियां रक्त पहुंचाने का काम करती हैं। स्वस्थ धमनियां लचीली होती हैं और हृदय की हर धड़कन के साथ फैलने और सिकुड़ने में सक्षम रहती हैं। लेकिन बढ़ती उम्र, उच्च रक्तचाप, रक्त में वसा की अधिक मात्रा, मधुमेह, मोटापा, धूम्रपान और अस्वस्थ जीवनशैली जैसे कई कारणों से धमनियां धीरे-धीरे कठोर हो सकती हैं। अगर यह प्रक्रिया उम्र से पहले शुरू हो जाए, तो इसे समय से पहले होने वाली धमनी वृद्धावस्था कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याओं के बढ़ते जोखिम का संकेत हो सकती है।

कम उम्र में भी कठोर हो सकती हैं धमनियां

अक्सर लोगों को लगता है कि धमनियों की उम्र भी उनकी वास्तविक उम्र के बराबर ही होगी, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। खराब जीवनशैली और कई स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों के कारण कम उम्र में भी धमनियों में कठोरता बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति उम्र में 50 साल का है, लेकिन उसकी धमनियों की स्थिति उससे अधिक उम्र के व्यक्ति जैसी हो सकती है। इसी अंतर को समय रहते पहचानना हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

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जांच में नहीं लगेगी सुई, न निकलेगा खून

आर्टसेंस तकनीक की सबसे खास बात इसका गैर-आक्रामक होना है। यानी जांच के लिए शरीर में चीरा लगाने या सुई लगाने की जरूरत नहीं होती। खून का नमूना भी नहीं लिया जाता। गर्दन के पास एक विशेष उपकरण की मदद से धमनी से जुड़े संकेतों को मापा जाता है। इसके अलावा रक्तचाप और रक्त प्रवाह से संबंधित आंकड़े भी जुटाए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया से डॉक्टरों को व्यक्ति की रक्त वाहिकाओं की स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।

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क्या इससे हार्ट अटैक का पता वर्षों पहले चल जाएगा?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। आर्टसेंस को हृदयाघात की निश्चित भविष्यवाणी करने वाली मशीन नहीं कहा जा सकता। यह तकनीक धमनियों की कठोरता और रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य से जुड़े संकेतकों को मापती है। इन संकेतकों से हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम का शुरुआती आकलन करने में मदद मिल सकती है। अगर जांच में धमनियों की स्थिति चिंताजनक दिखाई देती है, तो चिकित्सक व्यक्ति के रक्तचाप, रक्त में वसा की मात्रा, रक्त शर्करा, वजन, पारिवारिक इतिहास और अन्य जोखिम कारकों को ध्यान में रखकर आगे की जांच या उपचार की सलाह दे सकते हैं।

समय रहते बदली जा सकती है जीवनशैली

धमनियों में समय से पहले होने वाले बदलावों की जानकारी मिलने का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि व्यक्ति समय रहते अपनी जीवनशैली पर ध्यान दे सके। नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, वजन को नियंत्रित रखना, धूम्रपान से दूरी, रक्तचाप और रक्त शर्करा को नियंत्रण में रखना तथा रक्त में वसा की मात्रा की नियमित जांच जैसे कदम हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

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आईआईटी मद्रास का वेस्पा अभियान क्या है?

आईआईटी मद्रास (IIT Madras) की टीम वेस्पा नामक पहल के माध्यम से देश में रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य की शुरुआती जांच को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। इस पहल का उद्देश्य लोगों में रक्त वाहिकाओं की सेहत से जुड़े जोखिमों की समय रहते पहचान करना और हृदय संबंधी बीमारियों की रोकथाम की दिशा में शुरुआती कदम उठाना है।

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नोट : आर्टसेंस जैसी तकनीक हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को समझने और धमनियों में होने वाले बदलावों की शुरुआती पहचान में उपयोगी हो सकती है। हालांकि, केवल इस जांच के आधार पर हृदयाघात का खतरा तय नहीं किया जा सकता। हृदय की सेहत का सही आकलन हमेशा चिकित्सक की सलाह और अन्य जरूरी जांचों के साथ ही किया जाना चाहिए।


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Content Editor

Monika

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