बॉर्डरलाइन थायरॉइड वाले लोगों का क्या शुरू कर देनी चाहिए दवाइयां ? यहां समझिए इसका असली मतलब
punjabkesari.in Wednesday, Jan 21, 2026 - 05:55 PM (IST)
नारी डेस्क: थायराइड टेस्ट रिपोर्ट कन्फ्यूजिंग हो सकती हैं, खासकर जब नंबर साफ तौर पर नॉर्मल या एबनॉर्मल नहीं बताते और इसके बजाय एक ग्रे एरिया में आते हैं, जिसे अक्सर बॉर्डरलाइन कहा जाता है। यह शब्द सुनते ही लोग घबरा जाते हैं और तुरंत दवा शुरू करने की सोचने लगते हैं। लेकिन पैथोलॉजिस्ट के अनुसार बॉर्डरलाइन थायरॉइड का मतलब हर बार दवा की जरूरत नहीं होता। आइए समझते हैं बॉर्डरलाइन थायरॉइड लेवल के बारे में विस्तार से।
‘बॉर्डरलाइन थायरॉइड’ का मतलब क्या है?
जब थायरॉइड टेस्ट (TSH, T3, T4) की वैल्यू बिल्कुल नॉर्मल से थोड़ी ऊपर या नीचे होती है, लेकिन बहुत ज्यादा बिगड़ी हुई नहीं होती तो उसे बॉर्डरलाइन थायरॉइड कहा जाता है। इसे मेडिकल भाषा में अक्सर Subclinical Hypothyroidism या Subclinical Hyperthyroidism भी कहते हैं।
रिपोर्ट को कैसे समझें?
पैथोलॉजिस्ट के मुताबिक TSH हल्का बढ़ा या घटा होता है, T3 और T4 अक्सर नॉर्मल रहते हैं , इसका मतलब है कि मरीज को कोई या बहुत हल्के लक्षण होते हैं। इसलिए सिर्फ रिपोर्ट देखकर तुरंत दवा शुरू करना सही नहीं। पैथोलॉजिस्ट साफ कहते हैं कि हर बॉर्डरलाइन थायरॉइड में दवा की जरूरत नहीं होती। दवा तब जरूरी होती है जब TSH लगातार 6–10 से ऊपर बना रहे।थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना, ठंड ज्यादा लगना जैसे लक्षण हों। महिला प्रेग्नेंट हो या प्रेग्नेंसी प्लान कर रही हो। हार्ट की बीमारी या हाई कोलेस्ट्रॉल हो। रिपोर्ट 2–3 बार में भी नॉर्मल न आए
सिर्फ निगरानी (Monitoring) ही काफी है
इन हालात में डॉक्टर आमतौर पर इंतजार करते हैं जब कोई खास लक्षण नहीं हैं, TSH हल्का सा बढ़ा/घटा है। पहली बार रिपोर्ट बदली है तनाव, नींद की कमी या हाल की बीमारी रही हो। ऐसे मामलों में 6–8 हफ्ते बाद दोबारा टेस्ट कराया जाता है। पैथोलॉजिस्ट के अनुसार रिपोर्ट का इलाज नहीं, मरीज का इलाज किया जाता है। सही समय पर जांच, सही सलाह और जरूरत पड़ने पर ही दवा यही थायरॉइड को कंट्रोल करने का सही तरीका है।
बिना जरूरत दवा लेने से क्या नुकसान?
बेवजह दवा लेने से धड़कन तेज हो सकती है, घबराहट होती है, वजन घटता या बढ़ता है, हड्डियों पर असर हो सकता है। इसलिए सेल्फ मेडिकेशन बिल्कुल न करें। बॉर्डरलाइन थायरॉइड है तो संतुलित डाइट लें, तनाव कम करें, पर्याप्त नींद लें, आयोडीन और सेलेनियम की कमी न होने दें। डॉक्टर की सलाह से ही सप्लीमेंट लें।

