गाय के दिल की झिल्ली से बनाई नई नस, ट्यूमर निकालकर डॉक्टरों ने बचाई जान
punjabkesari.in Monday, Nov 02, 2026 - 02:04 PM (IST)
नारी डेस्क : मेडिकल साइंस में लगातार हो रही तरक्की कई बार ऐसे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बन जाती है, जिनका इलाज बेहद मुश्किल माना जाता है। ऐसा ही एक जटिल मामला लखनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) में सामने आया है। यहां डॉक्टरों ने 27 वर्षीय युवती के पेट से करीब 2 किलो का ट्यूमर निकालने के साथ उसकी शरीर की सबसे बड़ी नस का प्रभावित हिस्सा भी हटाया। इतना ही नहीं, गाय के दिल की झिल्ली से एक नई नस तैयार कर उसे शरीर में लगाया गया। इस जटिल सर्जरी के बाद युवती की दोनों किडनी सामान्य रूप से काम कर रही हैं।
एक साल तक इलाज के लिए भटकती रही युवती
यह मामला उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के पडरौना स्थित सिमरिया बाजार, हनुमानगंज की रहने वाली 27 वर्षीय दिव्या वर्मा का है। वह पिछले करीब एक साल से पेट में बढ़ रहे ट्यूमर की समस्या से परेशान थीं। उन्होंने कई अस्पतालों में इलाज के लिए संपर्क किया, लेकिन ट्यूमर की गंभीर स्थिति और ऑपरेशन में जान का जोखिम देखते हुए डॉक्टरों ने सर्जरी करने से इनकार कर दिया। आखिरकार दिव्या इलाज की उम्मीद लेकर लखनऊ के SGPGI पहुंचीं।

किडनी और शरीर की मुख्य नस से चिपका था ट्यूमर
SGPGI के यूरोलॉजी विभाग के यूरोलॉजिस्ट और किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ प्रो. संजय सुरेखा के मुताबिक, जांच में युवती के पेट के दाहिने हिस्से में करीब 20 सेंटीमीटर का ट्यूमर मिला। यह ट्यूमर शरीर की सबसे बड़ी नस आईवीसी (इंफीरियर वेना कावा) से बुरी तरह चिपका हुआ था। इतना ही नहीं, इसका जुड़ाव किडनी को खून पहुंचाने वाली नसों से भी था। आईवीसी शरीर की एक बेहद महत्वपूर्ण नस है, जो पैरों, किडनी, लिवर और आंतों से खून को वापस दिल तक पहुंचाती है। ऐसे में केवल ट्यूमर निकालना पर्याप्त नहीं था। डॉक्टरों को नस के प्रभावित हिस्से को भी हटाना पड़ा। इस दौरान दोनों किडनी को सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती थी।
यें भी पढ़ें : सोने की कलम से लिखी होती है इस मूलांक वालों की किस्मत, धन-वैभव खुद आता है इनके पास
गाय के दिल की झिल्ली से तैयार किया नया नस का रास्ता
डॉक्टरों की टीम ने पहले करीब 2 किलो का ट्यूमर निकाला। इसके बाद आईवीसी के प्रभावित हिस्से को हटाकर उसकी जगह नई नस तैयार की गई। इसके लिए बोवाइन पेरिकार्डियम (Bovine Pericardium) यानी गाय के दिल को ढकने वाली झिल्ली से बने विशेष ग्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया। विदेश में निर्मित इस ग्राफ्ट की कीमत करीब 50 हजार रुपये बताई गई है। डॉक्टरों ने इससे लगभग 8×4 सेंटीमीटर का पाइप जैसा ढांचा तैयार किया, जिसे नई आईवीसी के रूप में लगाया गया। इसके बाद बाईं किडनी की नस को नई आईवीसी से और दाईं किडनी की नस को गोनाडल वेन से जोड़ा गया। इस तरह शरीर में खून के प्रवाह के लिए नई व्यवस्था बनाई गई।

सर्जरी में क्यों था इतना बड़ा खतरा?
यह ऑपरेशन कई वजहों से बेहद जोखिम भरा था। सर्जरी के दौरान आईवीसी के फटने पर बहुत अधिक खून बहने और मरीज की जान जाने का खतरा था। वहीं, किडनी की नसों को नुकसान पहुंचने से दोनों किडनी फेल होने की आशंका भी थी। इसके अलावा नई नस में खून का थक्का जमने का खतरा था। ऐसा होने पर पैरों में सूजन आ सकती थी और थक्का फेफड़ों तक पहुंचने पर स्थिति जानलेवा हो सकती थी। इसी वजह से सर्जरी के बाद युवती को खून का थक्का बनने से रोकने के लिए विशेष दवाएं दी जा रही हैं।
यें भी पढ़ें : इन Blood Group वालों को सबसे ज्यादा काटते हैं मच्छर! जानिए क्या कहती है रिसर्च
कई विभागों की टीम ने मिलकर किया ऑपरेशन
इस जटिल सर्जरी में SGPGI के यूरोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अर्पण यादव, डॉ. आशीष रंजन, डॉ. प्रखर और डॉ. देवांशु शामिल रहे। इसके अलावा सीवीटीएस विभाग से प्रो. शांतनु पांडे की टीम और एनेस्थीसिया विभाग से प्रो. तपस सिंह, प्रो. दिव्या और प्रो. संदीप साहू ने भी सहयोग किया। डॉक्टरों के मुताबिक, सर्जरी के बाद युवती की दोनों किडनी सामान्य रूप से काम कर रही हैं। हालांकि, नई नस में खून का प्रवाह बना रहे और थक्का न जमे, इसके लिए उनकी निगरानी और दवाओं का उपचार जारी है। यह मामला दिखाता है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीक और अलग-अलग विशेषज्ञों की संयुक्त कोशिश से बेहद जटिल माने जाने वाले ऑपरेशन भी संभव हो सकते हैं।

