क्या ब्लड कैंसर दोबारा होने से बचा जा सकता है? जानिए बीमारी के रिलैप्स से जुड़ी जरूरी बातें
punjabkesari.in Thursday, Aug 06, 2026 - 11:26 AM (IST)
नारी डेस्क: फिल्म 'गजनी' में अपने दमदार विलेन वाले किरदार से पहचान बनाने वाले अभिनेता प्रदीप रावत अब हमारे बीच नहीं रहे। 74 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। शुरुआती जानकारी के अनुसार, उनकी मौत का कारण ब्लड कैंसर बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि वह पहले इस बीमारी को मात दे चुके थे, लेकिन कैंसर दोबारा लौट आने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई। ऐसे में एक बड़ा सवाल लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर ब्लड कैंसर दोबारा क्यों होता है और क्या इसे रोका जा सकता है?
आखिर क्यों दोबारा लौट आता है ब्लड कैंसर
ब्लड कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद भी कुछ मरीजों में बीमारी दोबारा लौट सकती है, जिसे मेडिकल भाषा में रिलैप्स (Relapse) कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह होती है कि इलाज के बावजूद शरीर में कैंसर की कुछ कोशिकाएं बच जाती हैं। इनकी संख्या इतनी कम होती है कि सामान्य जांच में इनका पता नहीं चल पाता। समय के साथ अगर ये कोशिकाएं फिर सक्रिय होकर बढ़ने लगें, तो बीमारी दोबारा सामने आ सकती है।

क्या ब्लड कैंसर को दोबारा होने से पूरी तरह रोका जा सकता है
फिलहाल ऐसा कोई पक्का तरीका मौजूद नहीं है, जिससे ब्लड कैंसर के दोबारा होने को पूरी तरह रोका जा सके। हालांकि सही इलाज, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह का पालन करके रिलैप्स के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि बीमारी दोबारा लौटती भी है, तो समय रहते उसका पता लगाकर इलाज शुरू किया जा सकता है।
हर ब्लड कैंसर एक जैसा नहीं होता
ब्लड कैंसर कई प्रकार का होता है और हर मरीज की स्थिति अलग होती है। ल्यूकेमिया (Leukemia), लिंफोमा (Lymphoma) और मल्टीपल मायलोमा (Multiple Myeloma) तीनों की प्रकृति, इलाज और रिकवरी का तरीका अलग-अलग होता है। यही कारण है कि एक मरीज का इलाज या अनुभव दूसरे मरीज पर लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए इलाज के बाद भी डॉक्टर की निगरानी में रहना बेहद जरूरी होता है।
इलाज के बाद नियमित जांच क्यों है जरूरी
ब्लड कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद मरीजों को नियमित फॉलो-अप के लिए अस्पताल जाना चाहिए। इन विजिट्स के दौरान डॉक्टर जरूरत के अनुसार ब्लड टेस्ट, बोन मैरो टेस्ट और PET-CT स्कैन जैसी जांच करवाते हैं। इन जांचों का मकसद यह पता लगाना होता है कि कहीं बीमारी दोबारा तो नहीं लौट रही। शुरुआती स्तर पर रिलैप्स पकड़ में आ जाए तो इलाज के बेहतर परिणाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

रिलैप्स का खतरा कम करने के लिए क्या किया जाता है
कुछ मरीजों को इलाज खत्म होने के बाद भी मेंटेनेंस थेरेपी दी जाती है। इसमें मरीज को कुछ समय तक दवाइयां जारी रखनी पड़ती हैं, ताकि शरीर में बची हुई कैंसर कोशिकाएं दोबारा सक्रिय न हो सकें। वहीं, जिन मरीजों में बीमारी लौटने का खतरा अधिक होता है या कैंसर वापस आ चुका होता है, उन्हें स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया के जरिए स्वस्थ स्टेम सेल्स की मदद से बोन मैरो को दोबारा तैयार किया जाता है और नई रक्त कोशिकाएं बनने में सहायता मिलती है।
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आधुनिक इलाज से बढ़ी मरीजों की उम्मीद
पिछले कुछ वर्षों में ब्लड कैंसर के इलाज के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। आज टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और CAR-T सेल थेरेपी जैसी आधुनिक तकनीकों ने मरीजों के इलाज के विकल्पों को पहले से बेहतर बनाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी मरीज में ब्लड कैंसर दोबारा भी हो जाए, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इलाज की सभी संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं। सही समय पर सही उपचार मिलने से अच्छे परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
कैसी होनी चाहिए जीवनशैली
विशेषज्ञों के अनुसार, स्वस्थ जीवनशैली शरीर की रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मरीजों को संतुलित और पौष्टिक भोजन करना चाहिए, नियमित रूप से हल्की शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए, धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए और शराब का सेवन सीमित रखना चाहिए। इसके अलावा संक्रमण से बचाव भी बेहद जरूरी है, क्योंकि कैंसर का इलाज लेने वाले मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है। हालांकि डॉक्टर यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल अच्छी जीवनशैली अपनाने से ब्लड कैंसर के रिलैप्स को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। इसके लिए दवाइयों का समय पर सेवन, नियमित मेडिकल जांच और डॉक्टर की सलाह का पालन करना सबसे जरूरी है।

इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
इलाज के बाद यदि मरीज को बार-बार बुखार आना, बिना किसी कारण वजन कम होना, लगातार थकान महसूस होना, लिम्फ नोड्स में सूजन, या शरीर में कोई असामान्य बदलाव दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करना नुकसानदायक हो सकता है। जितनी जल्दी बीमारी के संकेत पहचान लिए जाते हैं, उतनी ही जल्दी इलाज शुरू किया जा सकता है और मरीज के ठीक होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

