Anshula Kapoor का मेहंदी लहंगा नहीं था आम, 900 साल पुरानी पटोला विरासत से जीता ससुराल का दिल
punjabkesari.in Sunday, Jul 05, 2026 - 03:19 PM (IST)
नारी डेस्क : बोनी कपूर की बेटी अंशुला कपूर जल्द ही रोहन ठक्कर संग शादी के बंधन में बंधने जा रही हैं। शादी से पहले उनके प्री-वेडिंग फंक्शन्स की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। मेहंदी समारोह में अंशुला ने ऐसा लहंगा पहना, जिसने सिर्फ अपनी खूबसूरती ही नहीं बल्कि उससे जुड़ी 900 साल पुरानी भारतीय विरासत के कारण भी लोगों का ध्यान खींच लिया।
900 साल पुरानी पटोला कला को दिया सम्मान
अंशुला कपूर ने अपने मेहंदी समारोह के लिए मशहूर डिजाइनर अर्पिता मेहता का डिजाइन किया हुआ खूबसूरत पटोला-इंस्पायर्ड टील ब्लू लहंगा चुना। यह आउटफिट गुजरात की ऐतिहासिक पटोला बुनाई से प्रेरित था। खास बात यह रही कि अंशुला ने यह लहंगा अपने होने वाले ससुराल की गुजराती संस्कृति और विरासत को सम्मान देने के लिए पहना।

क्या है पटोला की खासियत?
पटोला भारत की सबसे प्राचीन और जटिल हस्तकरघा कलाओं में से एक मानी जाती है। इसका इतिहास करीब 900 साल पुराना बताया जाता है। 12वीं शताब्दी में सालवी समुदाय के बुनकर गुजरात के पाटन में आकर बसे थे। मान्यता है कि उस समय राजा कुमारपाल के संरक्षण में लगभग 700 सालवी परिवारों ने इस कला को आगे बढ़ाने के लिए अपना घर छोड़कर पाटन में बसने का फैसला किया था। तभी से पाटन पटोला बुनाई का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

लहंगे की खूबसूरती ने जीता दिल
अंशुला के टील ब्लू लहंगे में पारंपरिक पटोला मोटिफ्स के साथ डिजाइनर अर्पिता मेहता का सिग्नेचर मिरर वर्क, थ्रेड एम्ब्रॉयडरी और मल्टीकलर डिटेलिंग देखने को मिली। लहंगे के साथ उन्होंने वी-नेक ब्लाउज और चौड़े बॉर्डर वाला मैचिंग दुपट्टा कैरी किया, जिसने उनके पूरे लुक को रॉयल टच दिया।

स्टेटमेंट जूलरी ने बढ़ाई रॉयलनेस
अपने मेहंदी लुक को पूरा करने के लिए अंशुला ने टरक्वाइज स्टोन वाली लेयर्ड जूलरी चुनी। नेकपीस, झुमके और स्टेटमेंट रिंग्स उनके आउटफिट के साथ खूबसूरती से मेल खा रहे थे। वहीं, सॉफ्ट मेकअप और बालों में लगे गुलाबी फूलों ने उनके ब्राइडल लुक में ताजगी और एलिगेंस जोड़ दी।

कैसे बनती है पटोला साड़ी या लहंगा?
पटोला को डबल इकत (Double Ikat) तकनीक से तैयार किया जाता है, जिसे दुनिया की सबसे कठिन बुनाई तकनीकों में गिना जाता है। इसमें ताने और बाने दोनों के धागों को पहले डिजाइन के अनुसार बांधकर प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है। इसके बाद बेहद सटीक तरीके से करघे पर बुनाई की जाती है, ताकि कपड़े के दोनों ओर एक जैसा डिजाइन दिखाई दे। एक असली पटोला तैयार करने में कई महीनों से लेकर एक साल या उससे अधिक समय भी लग सकता है।

शुभता और नजर से बचाव का प्रतीक
कई गुजराती परिवारों में पटोला को सिर्फ एक परिधान नहीं, बल्कि शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता भी है कि पटोला दुल्हन को बुरी नजर से बचाने का प्रतीक होता है। यही वजह है कि इसे शादी और खास अवसरों पर उपहार के रूप में भी दिया जाता है।

